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महाराणा प्रताप की जीवनी व इतिहास

महाराणा प्रताप की जीवनी व इतिहास
महाराणा प्रताप की जीवनी
जन्म
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 के शुभ दिन महाराणा सांगा के पुत्र उदयसिंह एवं महारानी जयवंता बाई के यहाँ राजसमंद जिले में स्थित कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ । हालांकि इतिहासकारों में जन्म स्थान को लेकर मतभेद है, इतिहासकार जेम्स टॉड के अनुसार महाराणा प्रताप सिंह का जन्म मेवाड़ के कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ, जबकि इतिहासकार विजय नाहर के मतानुसार बालक प्रताप का जन्म अपने नाना सोनगरा अखैराज के राजमहलों में हुआ था । महाराणा प्रताप को बचपन में “ कीका “ नाम से बुलाया जाता था ।
28 फरवरी 1572 को पिता उदयसिंह की मृत्यु होने से पूर्व ही उन्होंने अपनी सबसे छोटी रानी धीरबाई ( राणी भटियाणी ) के पुत्र जगमाल सिंह को मेवाड़ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया, जबकि जेष्ठ पुत्र होने के कारण प्रताप सिंह स्वाभाविक रूप से उत्तराधिकारी था । जगमाल सिंह विलासी प्रवर्ति का अयोग्य राजकुमार था इसलिए राज्य के अधिकतर सामंत जगमाल सिंह के बजाय प्रताप सिंह को महाराणा की गद्दी के लिए योग्य उम्मीदवार मानते थे ।
इधर जगमाल सिंह के हाथ में सत्ता आते ही उसके भोग विलास और जनता पर अत्याचार बढ़ने लगे । प्रताप सिंह ने भी छोटे भाई को समझने की कोशिश की परंतु सत्ता के अंधे जगमाल सिंह ने इसे अनदेखा कर दिया । जब जगमाल सिंह की अयोग्यता और अत्याचार हद से बढ़ने लगे तब विवश होकर मेवाड़ के समस्त सरदार एकत्र हुए और प्रताप सिंह को राजगद्दी पर आसीन करवाया । प्रताप सिंह का प्रथम राजतिलक 1 मार्च 1573 के दिन उदयपुर के नजदीक गोगुन्दा नामक गाँव में हुआ, और इसी दिन से प्रताप सिंह, महाराणा प्रताप नाम से जाना जाने लगा । महाराणा प्रताप का शारीरिक सौष्ठव ही उनके दुश्मनों के दिलों में भय पैदा करने में सक्षम था, महाराणा प्रताप साढ़े सात फिट लंबे थे और 110 किलो वजनी थे, युद्ध में जाते समय उनके साथ 80 किलोग्राम का भाला, 208 किलोग्राम की दो तलवारें और 72 किलोग्राम का लोहे का कवच होता था ।
महाराणा प्रताप का रीति रिवाजों के अनुसार द्वितीय राजतिलक कुम्भलगढ़ दुर्ग में किया गया । इधर प्रताप सिंह के राजगद्दी हथियाने के विरोध स्वरूप जगमाल सिंह ने अकबर से मित्रता गांठ ली ।
महाराणा प्रताप के राज्य की राजधानी उदयपुर थी । उन्होंने सन 1568 से 1597 तक शासन किया । उदयपुर पर विदेशी आक्रमणकारियों के संकट को देखते हुए और सामन्तों की सलाह मानकर महाराणा प्रताप ने उदयपुर छोड़कर कुम्भलगढ़ और गोगुंदा के पहाड़ी इलाके को अपना केन्द्र बनाया ।
 महाराणा प्रताप ने अपने जीवनकाल में कुल 16 शादियाँ की थी, जिनसे उनके 17 पुत्र और 5 पुत्रियाँ थी ।
1568 में मुगल सेना द्वारा चित्तौड़गढ़ किले की विकट घेराबंदी के कारण मेवाड़ की उपजाऊ पूर्वी बेल्ट अकबर के नियंत्रण में आ गई । हालाँकि जंगल और पहाड़ी इलाका अभी भी महाराणा के कब्जे में थे । मेवाड़ पर अकबर की नजर इसलिए भी थी क्योंकि वह मेवाड़ से होते हुए के गुजरात के लिए एक स्थिर तलाश कर रहा था ।
महाराणा प्रताप के शासनकाल के समय तक लगभग पूरे उत्तर भारत में मुगल बादशाह अकबर का साम्राज्य, जिसमें अकबर लगातार बढ़ोतरी कर रहा था । मेवाड़ साम्राज्य अकबर के साम्राज्य विस्तार की राह में रोड़ा बना हुआ था । इसके लिए अकबर ने महाराणा प्रताप को अधीनता स्वीकार करने के लिए चार बार प्रताव भेजे ( सितंबर 1572 में जलाल खाँ, मार्च 1573 में मानसिंह, सितंबर 1573 में भगवानदास, दिसंबर 1573 में टोडरमल ) । परंतु हर बार निराश हाथ लगी, महाराणा प्रताप ने मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार करने से लड़ते हुए मरना श्रेष्ठ माना । अकबर ने महाराण को व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत होने का संदेशा भिजवाया परंतु महाराणा ने इनकार कर दिया, तब युद्ध से ही मेवाड जीतना अकबर के लिए जरूरी हो गया था । जिसके परिणाम स्वरूप 18 जून 1576 को हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ ।

हल्दीघाटी का युद्ध ( 18 जून 1576 )
हल्दीघाटी का युद्ध
18 जून 1576 को मुगल बादशाह के साम्राज्य विस्तार की नीति के फलस्वरूप हल्दीघाटी नामक दर्रे के नजदीक मेवाड़ की सेना ( जिसका सेनापति महाराणा प्रताप था ) और मुगलिया साम्राज्य की सेना ( मानसिंह और आसफ खान ) के बीच भीषण युद्ध हुआ । मेवाड़ की ओर से भील सेना के सरदार राणा पूंजा भील थे, जिन्होंने इस युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाया । इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार हकीम खाँ सूरी थे ।
हल्दीघाटी युद्ध में मेवाड़ की सेना में 20 हजार और मुगल सेना में 50 हजार सैनिक थे, फिर भी मेवाड़ के योद्धाओं ने मुगलों को नाकों चने चबवाये । महाराणा प्रताप ने इस युद्ध में अपनी युद्धकला और वीरता का परचम लहराया । जिस ओर उनका घोड़ा चेतक मुँह घुमा लेता उस तरफ दुश्मनों की लाशों के ढेर लग जाते । दुश्मन सेना के लिए महाराणा और चेतक यमराज और उसके भैसे की तरह दिखाई दे रहा था । इस पूरे युद्ध में मेवाड़ की सेना मुगलों पर भारी पड़ रही थी और उनकी रणनीति सफल हो रही थी । महाराणा ने हाथी पर सवार मुगलों के सेनापति मान सिंह पर चेतक से हमला किया । मानसिंह ने हाथी के ऊपर बने हौदे में छुपकर जान बचाई । इस हमले में चेतक को भी गहरी चोटें आई, चेतक युद्ध में महाराणा का अहम साथी था । यह देखकर मुगल सेना युद्ध छोड़कर केवल महाराणा प्रताप को पकड़ने पर आमाद दिखने लगी, तब बींदा के झाला मान ने महाराणा प्रताप का मुकुट स्वयं धारण कर अपने प्राणों का बलिदान दिया और महाराणा प्रताप को युद्धक्षेत्र से निकलकर उनके जीवन की रक्षा की । युद्धक्षेत्र से निकलते समय मुगल सेना ने महाराणा का पीछा किया और एक विशाल नाले को पार करने के पश्चात स्वामिभक्त चेतक की मृत्यु हो गई । इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध अनिर्णित रहा । अकबर ने अपनी विशाल सेना महाराणा प्रताप को जिंदा या मुर्दा लाने के उद्देश्य से भेजी थी, जिसमें वो नाकाम रहा । वहीं महाराणा प्रताप को भी मेवाड़, चित्तौड़, गोगुन्दा, कुम्भलगढ़, उदयपुर आदि इलाके छोड़ने पड़े ।
इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनी ने किया था ।
इस युद्ध के पश्चात महाराणा ने जंगलों में शरण ली और धीरे धीरे अपनी शक्ति बढ़ाने लगे । इस मुसीबत के वक्त पर उनके मित्र और विश्वासपात्र सलाहकार भामाशाह द्वारा महाराणा को अपना सम्पूर्ण धन अर्पित कर दिया गया ।
वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला। 
उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला॥
इस सहयोग से महाराणा में नये उत्साह का संचार हुआ । अगले तीन वर्षों में महाराणा ने पुन: सैन्य शक्ति संगठित कर मुगलों से एक एक कर अधिकांश इलाके छीन लिये । 
हल्दीघाटी का नाला फांदता चेतक

 दिवेर का युद्ध ( मेवाड़ के मैराथन )

महाराणा प्रताप ने धीरे धीरे अपनी शक्ति अर्जित की और अक्टूबर 1582 में दिवेर और छापली के दर्रो के मध्य हुए दिवेर का युद्ध में मुगल सेना को वापस लौटने पर मजबूर कर दिया । यह इतिहास का एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में महाराणा प्रताप को अपने खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई । इस युद्ध के पश्चात महाराणा प्रताप व मुगल सल्तनत के बीच एक लम्बा संघर्ष चला, इसलिए कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध को " मेवाड़ का मैराथन " कहा था |
दिवेर का युद्ध

दिवेर के युद्ध के पश्चात महाराणा प्रताप एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे, उधर अकबर भी अपने साम्राज्य में हो रहे विद्रोहों को दबाने में उलझ गया परिणामस्वरूप मेवाड़ में मुगल साम्राज्य का शिकंजा छूटने लगा । इसका लाभ उठाकर महाराणा प्रताप ने 1585 तक लगभग सम्पूर्ण मेवाड़ पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया । इस लंबे संघर्ष के पश्चात भी मेवाड़ अकबर के हाथों से फिसल गया । महाराणा प्रताप सिंह के डर से ही अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर गया और तब तक वापस नहीं लौटा जब तक की महाराणा के स्वर्ग सिधारने का समाचार नहीं मिला ।
उसके बाद महाराणा प्रताप अपने राज्य की उन्नति में जुट गए, परंतु दुर्भाग्य से 19 जनवरी 1597 को अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई ।


उपसंहार

महाराणा प्रताप के स्वर्गवास के समय अकबर लाहौर में था, जब उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है । अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस प्रकार है -:
अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी !
गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी !!
नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली !
न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली !!
गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी !
निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी !!
अर्थात -:  हे गेहलोत राणा प्रताप सिंह तेरी मृत्यु पर शाह यानी सम्राट ने दांतों के बीच जीभ अपनी दबाई और निःश्वास के साथ आंसू टपकाए । क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया । तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धुरे को बांए कंधे से ही चलाता रहा । तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया । तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा । इसलिए मैं कहता हूँ कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया ।
महाराणा प्रताप को उनके स्वाभिमान, अदम्य साहस, जिजीविषा और कभी हार न मानने वाले जज्बे की वजह से भारतीय इतिहास में सम्मानपूर्वक देखा और पढ़ा जाता है । आज भी महाराणा प्रताप का जीवन चरित्र समस्त भारतीयों के लिए गर्व का विषय है ।
अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए अपना जीवन बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके उनके स्वामिभक्त चेतक को शत-शत नमन । 🙏🙏🙏🙏
महाराणा प्रताप

Leaders of Opposition in Rajasthan Assembly

Leaders of Opposition List in Rajasthan Assembly (Vidhan Sabha):

  • Jaswant Singh
    • (29-03-1952  to  09-04-1956)
  • Tan Singh
    • (03-12-1956  to  31-03-1957)
  • Narendra Singh
    • (24-04-1957  to  01-03-1962)
  • Maharawal Laxman Singh
    • (13-03-1962  to  28-02-1967,
    • 03-05-1967  to  15-03-1972,
    • 20-03-1972  to  30-04-1977,
    • 24-09-1979  to  11-10-1979)  
  • Parasram Maderna
    • (18-07-1977  to  13-11-1978,
    • 16-02-1979  to  29-08-1979,
    • 31-12-1993  to  30-11-1998)
  • Ram Narain Choudhary
    • (13-11-1978  to  15-02-1979)
  • Bhairon Singh Shekhawat
    • (15-07-1980  to  09-03-1985,
    • 28-03-1985  to  30-12-1989,
    • 08-01-1999   to   18-08-2002 )  
  • Kedar Nath Sharma
    • (28-12-1989  to  01-03-1990)
  • Haridev Joshi
    • (19-03-1990  to  15-12-1992)
  • Gulab Chand Kataria
    • (24-08-2002   to   04-12-2003)
    • (21-02-2013   to   09-12-2013)
  • Dr. Bulaki Das Kalla
    • (16-01-2004   to   26-01-2006)
  • Ram Narayan Choudhary
    • [27-01-2006  to  16-10-2007]
  • Hema Ram Choudhary
    • (16.10.2007 to 10.12.2008)
  • Smt. Vasundhara Raje
    • (02.01.2009 to 25.02.2010,
    • 09.03.2011 to 20.02.2013)
  • Rameshwar Lal Dudi
    • (23.01.2014 to till today)

राजस्थान के प्रमुख जौहर, साका Rajasthan Jauhar, Saka

राजस्थान के प्रमुख जौहर, साका (Jauhar, Saka in Rajasthan) : राजस्थान के इतिहास में "जौहर तथा साकों" का एक विशिष्ठ स्थान है। यहाँ पर युद्ध में वीर सैनिकों एवं उनकी स्त्रियों ने शत्रु की पराधीनता को स्वीकार करने की बजाए सहर्ष मृत्यु का चुनते हुए जान न्यौछावर की है। जौहर व साका उस स्थिति में किए गए जब शत्रु को घेरा डाले बहुत अधिक दिन हो गए या युद्ध में हार निश्चय हो या शत्रु ने युद्ध में विजय प्राप्त कर ली हो। जौहर की घटनाएँ मुख्यत: राजस्थान में मुगल शासकों के आक्रमण एवं युद्ध में हराने के पश्चात उनके द्वारा लूट-पाट एवं स्त्रियों के शीलभंग के कारण होती थी।
जौहर किसे कहते हैं: युद्ध के बाद महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों व व्यभिचारों से बचने तथा अपनी पवित्रता कायम रखने हेतु महिलाएं अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा करके जलती चिताओं में कूद पड़ती थी। वीरांगना महिलाओं का यह आत्म बलिदान का कृत्य जौहर के नाम इतिहास में जाना जाता है। जौहर कर लेने का कारण युद्ध में हार होने पर शत्रु राजा द्वारा हरण किये जाने का भय होता था।
साका किसे कहते हैं: युद्ध के दौरान जब युद्ध में हार निश्चित हो जाती थी एवं महिलाओं को जौहर की ज्वाला में कूदने का निश्चय करते देख पुरूष केशरिया वस्त्र धारण कर मरने मारने के निश्चय के साथ युद्ध में दुश्मन सेना पर टूट पड़ते थे कि या तो विजयी होकर लोटेंगे अन्यथा विजय की कामना हृदय में लिए अन्तिम दम तक शौर्यपूर्ण युद्ध करते हुए दुश्मन सेना का ज्यादा से ज्यादा नाश करेंगे। इसे साका कहा जाता है।

राजस्थान के प्रमुख जौहर, साका (Jauhar, Saka in Rajasthan)
  • चित्तौड़गढ़ के 3 साके
    1. प्रथम साका: यह सन् 1303 में राणा रतन सिंह के शासनकाल में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण के समय हुआ था। इसमें रानी पद्मनी सहित स्त्रियों ने जौहर किया था। अलाउद्दीन की महत्वाकांक्षा और राणा रतनसिंह की अनिंद्य सुंदरी रानी पद्मिनी को पाने की लालसा हमले का कारण बनी। चित्तौड़ के दुर्ग में सबसे पहला जौहर चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16000 हजार रमणियों ने अगस्त 1303 में किया था।
    2. दूसरा साका:  यह 1534 ई. में राणा विक्रमादित्य के शासनकाल में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के समय हुआ था। इसमें राजमाता हाड़ी (कर्णावती) और दुर्ग की सैकड़ों वीरांगनाओं ने जौहर का अनुष्ठान कर अपने प्राणों की आहुति दी।
    3. तीसरा साका: यह 1567 में राणा उदयसिंह के शासनकाल में अकबर के आक्रमण के समय हुआ था जिसमें जयमल और पत्ता के नेतृत्व में चित्तौड़ की सेना ने मुगल सेना का जमकर मुकाबला किया और स्त्रियों ने जौहर किया था। यह साका जयमल राठौड़ और फत्ता सिसोदिया के पराक्रम और बलिदान के प्रसिद्ध है।
  • जैसलमेर के ढाई साके:
    1. प्रथम साका:  यह अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हुआ था। इसमें भाटी शासक रावल मूलराज, कुंवर रतनसी सहित अगणित योद्धाओं ने असिधारा तीर्थ में स्नान किया और ललनाओं ने जौहर का अनुष्ठान किया।
    2. दूसरा साका:  दूसरा साका फिरोज शाह तुगलक के शासन के शुरुआती वर्षों में हुआ। रावल, दूदा, त्रिलोकसी व अन्य भाटी सरदारों और योद्धाओं ने शत्रु सेना से लड़ते हुए वीरगति पाई और दुर्गस्थ वीरांगनाओं ने जौहर किया।
    3. तृतीय साका (आधा साका): यह घटना 1550 ईस्वी में लूणकरण के शासन काल में कंधार के शासक अमीर अली के आक्रमण के समय हुआ था। तीसरा साका अद्र्ध साका कहलाता है। कारण इसमें वीरों ने केसरिया तो किया लेकिन जौहर नहीं हुआ। अत: इसे आधा साका ही माना जाता हैं। इसलिए जैसलमेर के ढाई साके गिने जाते हैं।  
  • गागरोण (जालौर) के 2 साके
    1. प्रथम साका: 1423 ईस्वी में अचलदास खींची के शासन काल में माण्डू के सुल्तान होशंगशाह के आक्रमण के समय हुआ था। इसमें रानियों व स्त्रियों ने जौहर किया।
    2. दूसरा साका: गागरोण का दूसरा साका 1444 ईस्वी में हुआ। जब मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी ने विशाल सेना के साथ इस दुर्ग पर आक्रमण किया एवं स्त्रियों ने जौहर किया।
  • रणथंभौर का 1 साका: यह सन् 1301 में अलाउद्दीन खिलजी के ऐतिहासिक आक्रमण के समय हुआ था। इसमें हम्मीर देव चौहान विश्वासघात के परिणामस्वरूप वीरगति को प्राप्त हुआ तथा उसकी पत्नी रंगादेवी ने जौहर किया था। इसे राजस्थान का प्रथम साका माना जाता है। 
  • जालौर का 1 साका: कान्हड़देव के शासनकाल में 1311-12 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय हुआ था एवं स्त्रियों ने जौहर किया।

Commemoration of 475th Birth Anniversary of Maharana Pratap

As part of “Maharana Pratap’s 475th Birth Anniversary Commemoration”, the Ministry of Culture, Government of India along with Nehru Memorial Museum and Library (NMML), New Delhi and University of Rajasthan, Jaipur are organizing a Special Lecture and a National Conference at University of Rajasthan Campus, Jaipur on Friday, 4th March 2016. Prof. Ghanshyam Lal Devra, former Vice Chancellor of Vardhman Mahaveer Open University, Kota will deliver the Special Lecture on the topic ‘Construction of “Mewar Legacy”: Maharana Pratap’s Conflict against the Mughals’. The Special Lecture will be followed by a Conference on “Maharana Pratap and His Times”. 
The day-long conference on ‘Maharana Pratap and His Times’ will explore the historical and cultural context of the life, work and legacy of Maharana Pratap. Scholars drawing on a variety of historical sources, Persian literary writings, epigraphic evidences, vernacular literary traditions as well as archaeological heritage will add fresh insights to the contribution of Maharana Pratap and historical significance of his times. 
Shri J.P. Singhal, Vice Chancellor, University of Rajasthan, Jaipur will deliver the Inaugural Address. Shri Sanjiv Mittal, Director, NMML and Joint Secretary, Ministry of Culture will preside over the function. Eminent scholars including Prof. V.K. Vashistha, Prof. K.S. Gupta, Prof. B.L. Badhani, Dr. M.S. Ranawat and Dr. Hukum Singh Bhati, etc. will present their papers in various sessions of the Conference, which will be followed by discussion. 

भोमट का भील आन्दोलन

भोमट का भील आन्दोलन (1918): राजस्थान भोमट का भील आन्दोलन एवं अन्य आंदोलनों के नोट्स, हमारी "Rajasthan GK" फ्री मोबाइल एप्प से भी पढ़ सकते हैं । राजस्थान सामान्य-ज्ञान नोट्स, समसामयिकी एवं प्रश्नोत्तरी।  उदाहरण के तौर पर आपके लिए "राजस्थान का भोमट का भील आन्दोलन (1918)" के नोट्स है ।
  • 1918 ई० में मेवाड़ सरकार के प्रशासनिक सुधारों के विरुद्ध भोमट के भीलों ने आन्दोलन छेड़ दिया।
  • गोविन्द गुरु ने भीलों में एकता स्थापित करने का प्रयास किया। मोतीलाल तेजावत ने भील आन्दोलन का नेतृत्व किया, जिसके कारण इस आन्दोलन ने और जोर पकड़ लिया। 
  • भीलों ने लागत तथा बेगार करने से इनकार कर दिया। सरकार ने आन्दोलन को कुचलने के लिए दमन - चक्र का सहारा लिया, किन्तु उसे सफलता नहीं मिली।  इस आन्दोलन से भीलों को अनेक सुविधाएँ प्राप्त हुई। 
  • भीलों में सर्वप्रथम मोतीलाल तेजावत ने राजनीतिक चेतना जागृत की। इसके बाद भीलों की आर्थिक स्थिति को सुधारने तथा उनके अन्ध - विश्वासों को दूर करने के लिए बनवासी संघ की स्थापना की गई।
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President Rule in Rajasthan

President Rules in Rajasthan was imposed total 4 Times on following occasions  and reason as mentioned below: 
Emergency State
Begins
Ends
Total Days
Reason of Emergency
Rajasthan
13-Mar-67
26-Apr-67
44
Indecisive outcome of elections
Rajasthan
29-Apr-77
22-Jun-77
54
Government dismissed in spite of Hari Dev Joshi enjoying majority support in Assembly
Rajasthan
16-Feb-80
6-Jun-80
111
Government dismissed in spite of Bhairon Singh Shekhawat enjoying majority support in Assembly
Rajasthan
15-Dec-92
4-Dec-93
354
Government dismissed in spite of Bhairon Singh Shekhawat enjoying majority support in Assembly

एक मुट्ठी बाजरे के लिए मैं हिन्दुस्तान की सल्तनत खो देता

दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी (17 मई 1540 – 15 मई 1545) ने बाबर के उत्तराधिकारी हुमायूं को हराकर दिल्ली पर अधिकार किया एवं लगभग 5 वर्ष तक शासन किया।  शेरशाह सूरी ने राजस्थान में मारवाड़ के शासक मालदेव की बढ़ती हुई शक्ति देखकर 1543 ई में मारवाड़ के निकट सुमेल गांव 80000 की फ़ौज़ मालदेव की 50000 की फ़ौज़ के साथ "गिरी-सुमेल" का युद्ध लड़ा । मालदेव ने शेरशाह की सेना के ऐसे दाँत खट्टे किये कि एक बार तो शेरशाह का हौसला पस्त हो गया। परन्तु अन्त में छल-कपट से शेरशाह जीत गया। फिर भी मारवाड़ से लौटते हुए यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ा - ""खैर हुई वरना मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिन्दुस्तान की सल्तनत खो देता।''
QUIZ. “एक मुट्ठी बाजरे के लिए मैं हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता।“ यह कथन किसका है?
A. रणमल
B. हुमायूँ
C. शेरशाह
D. औरंगज़ेब
Answer: C

अरबी फारसी शोध संस्थान, टोंक । Maulana Abul Kalam Azad Arabic Persian Research Institute, Tonk

अरबी फारसी शोध संस्थान, टोंक । Maulana Abul Kalam Azad Arabic Persian Research Institute (APRI), Tonk: Rajasthan Arabic and Persian Research Institute (MAAPRI), Tonk is the premier Indian institute engaged in promotion and furtherance of Arabic and Persian studies. This institute was established by the Government of Rajasthan in 1978 with the main objective of conserving and preserving the sources of Persian and Arabic manuscripts available in Rajasthan.
Objectives of APRI Tonk:
  • To acquire, preserve and conserve Arabic and Persian original sources of historical and cultural importance available in Rajasthan or pertaining to Rajasthan.
  • To promote and cultivate Arabic and Persian research and studies based primarily on the above mentioned sources and to provide facilities and amenities to scholars therefor.
  • To edit, translate, publish and decipher original sources.
  • To commission competent scholars to facilitate editing, deciphering, translating etc. of original sources and to undertake work on various aspects related to the objectives of the Institute.
  • To facilitate and assist in the documentation of Arabic and Persian source material of research value available with bodies other than the Institute.
  • To encourage, facilitate and to establish techniques of research methodology in Arabic and Persian studies.
  • To undertake and encourage the study of the declining oriental arts like calligraphy and paleography etc.
  • To institute prizes, scholarships, fellowships and awards for research and higher studies in Orientalogy.
  • To undertake all necessary measures to promote and advance the aims and objects of the Institute e.g. to organize seminars, symposia, colloquia, conferences, workshops, exhibitions and extension lectures etc. and publication of research Journals.
राजस्थान "सामान्य-ज्ञान" के सम्पूर्ण नोट्स, समसामयिकी एवं टेस्ट अब मोबाइल एप्प पर भी उपलब्ध है।  "राजस्थान GK" फ्री एप्प डाउनलोड करें:  http://tinyurl.com/rajasthangk
- राजस्थान के प्रमुख अनुसंधान केंद्र
 

Dadabadi, Malpura

Dadabadi, Malpura: Malpura is main pilgrimage centre of Dada Jin Kushal Suri, a famous acharya of Khartar Gacch sect of Swetambar Jain. Malpura is known for its Dadabadi, built by the Khartargach Sect of Shewtambar Jain in memory of 3rd Dada Gurudev Shri Jinkushalsurishwarji..   Vasupujya Swami Temple and Ambika Devi temple are also situated at Dadabadi premises.

जयपुर प्रजामण्डल (1931) | Jaipur Prajamandal

जयपुर प्रजामण्डल (1931) Jaipur Prajamandal:
  • 1931 ई॰ मे कपूरचन्द पाटनी ने जयपुर प्रजामण्डल का गठन किया था। यह राजस्थान का प्रथम प्रजामण्डल था।
  • सन् 1936  में जयपुर राज्य प्रजा मण्डल का पुनगर्ठन हुआ। इस कार्य के लिए वनस्थली से हीरालाल शास्री को आमन्त्रित किया गया और उन्हें प्रजा मण्डल का प्रधानमंत्री बनाया गया। प्रजामण्डल के सभापति सुप्रसिद्ध एडवोकेट श्री चिरंजीलाल मिश्र बनाए गये। 
  • 1938  में प्रजा मण्डल का पहला अधिवेशन जयपुर में हुआ। इसके अध्यथ सेठ जमनालाल बजाज थे। 
  • 1940 ई॰मे हीरालाल शास्त्री जयपुर प्रजामण्डल के अध्य्क्ष बने थे।
  • 1942 ई॰मे भारत छोङो आँदोलन के समय जयपुर के प्रधानमँत्री मिर्जा इस्माइल ने हीरालाल शास्त्री के साथ "जैन्टलमैन एग्रीमेन्ट"किया था। जिसके अनुसार जयपुर प्रजामण्डल के सदस्यो ने भारत छोङो आँदोलन मे भाग नहीँ लिया परँतु जो सदस्य भाग लेना चाहते थे उन्होने बाबा हरिश्चन्द्र के नेत्रत्व मे "आजाद मोर्चे"का गठन करके भाग लिया था।
  • 1944 ई॰मे जानकी लाल बजाज ने जयपुर प्रजामण्डल की अध्य्क्षता की थी 
  • 15 मई, 1946 को प्रजामण्डल के प्रतिनिधि के रुप में देवी शंकर तिवारी को मंत्रिमंडल में सम्मिलित किया गया। 27 मार्च, 1947 को नया मंत्रिमंडल बना, जिसमें 7 सदस्यों में से 4 सदस्य प्रजामण्डल के व 2  जागीरदार वर्ग के थे। 
  • नवम्बर, 1948 में जयपुर महाराजा राजस्थान में मिलने को सहमत हो गये, जिसकी राजधानी जयपुर व महाराजा राज प्रमुख बने। श्री हीरालाल शास्री पुनर्गठित राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए।
  • अप्रैल, 1949 को जयपुर राजस्थान का एक अंग बन गया
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राजस्थान के प्राचीन क्षेत्र एवं नाम

राजस्थान के प्राचीन क्षेत्र एवं उनका वर्तमान नाम, जिले :

राजस्थान के प्राचीन क्षेत्र
वर्तमान नाम एवं जिले
यौद्धैय
 श्रीगंगानगर हनुमानगढ़ के पास का क्षेत्र
अहिच्छत्रपुर
 नागौर (जांगल प्रदेश की राजधानी)
गुर्जरत्रा
 जोधपुर पाली
वल्ल /दुंगल/माड
 जैसलमेर
स्वर्णगिरि
 जालोर
चंद्रावती
 आबू
शिव/मेदपाट या मेवाड़
 उदयपुर चित्तौड़
वागड़
 डूंगरपुर बाँसवाड़ा
शूरसेन
 भरतपुर करौली धौलपुर
हय / हाड़ौती
 कोटा बूँदी झालावाड़
विराट/बैराठ
 अलवर जयपुर
जांगल
 बीकानेर जोधपुर
शाकम्भरी
 सांभर
ढूंढाड़
 जयपुर टौंक
मालव देश
 प्रतापगढ़ झालावाड़
कांठल
 प्रतापगढ़
मत्स्य प्रदेश
 भरतपुर अलवर का क्षेत्र
आर्बुद प्रदेश
 सिरोही
गोंडवाड़ा
 जालोर पाली का कुछ भाग