धनोप माता मंदिर की जानकारी व इतिहास

धनोप माता मंदिर की जानकारी व इतिहास

धनोप माता मंदिर, धनोप भीलवाड़ा


यदि आप भीलवाड़ा के धनोप माता मंदिर के दर्शन और इसके पर्यटक स्थल की जानकारी लेना चाहते हैं तो हमारे इस लेख को पूरा जरूर देखें जिसमें हम आपको धनोप माता मंदिर का इतिहास, दर्शन का समय और यात्रा से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण जानकारी के बारे में बताने वाले है –

मेवाड के शक्तिपीठो में एक प्राचीन शक्तिपीठ धनोप माता का मन्दिर भीलवाड़ा से 80 किलोमीटर की दूरी पर है, यह दिल्ली मुम्बई मेगा हाईवे व बिजयनगर -गुलाबपुरा रेलवे स्टेशन से 30 किलोमीटर की दूरी पर धनोप नामक एक छोटे से गांव में स्थित एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है ।

 

संगरिया गांव से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित शीतला माता को समर्पित धनोप माता मंदिर राजस्थान राज्य के प्रमुख मंदिर में से एक है, जहाँ हर साल बड़ी संख्या में भक्त शीतला माता के दर्शन के लिए आते है । इस मंदिर की वास्तुकला भी काफी आकर्षक है जो इसके अन्य आकर्षण के रूप में कार्य करती है ।

धनोप माता मंदिर एक ऊंचे टीले पर बना हुआ है, जो बेहद प्राचीन प्राकृतिक संरचना है । इस मंदिर में विक्रम संवत 912 भादवा सुदी 2 का शिलालेख भी उपस्थित है, जिससे इस बात का पता चला है कि यह मंदिर लगभग 1100 साल पुराना है । माता का मंदिर धनोप गाँव में स्थित है जिसकी वजह से इस मंदिर को धनोप माता मंदिर कहा जाता है । माना जाता है कि प्राचीन काल में धनोप एक समृद्ध नगर था जिसमें कई सुंदर मंदिर, भवन, बावड़ियाँ, कुण्ड बने थे । इस नगर में दोनों तरफ मानसी और खारी नदी बहती थी, जिनके अवशेष आज भी विद्यमान है । प्राचीन काल में यह नगर राजा धुंध की नगरी थी जिसे “ ताम्बवती ” नगरी भी बोला जाता था ।

आपको बता दें कि राजा के नाम से ही इस जगह का नाम धनोप पड़ा था । धनोपमाता राजा की कुल देवी थी । धनोप माता मंदिर में अन्नपूर्णा, चामुण्डा और कालिका माता की खूबसूरत मूर्ति स्थापित है जिनका मुख पूर्व दिशा की ओर है । इनके अलावा यहां पर भैरु जी का स्थान भी है और शिव-पार्वती, कार्तिकेय, गणेश व चौंसठ योगिनियों की मूर्तियाँ भी है । वैसे तो माता के दर्शन के लिए रोजाना हजारों तीर्थ यात्री आते हैं लेकिन नवरात्रा के दौरान यहां धनोप माता का मेला भी लगता है जिसमें लाखों की संख्या में यात्री शामिल होते हैं ।

धनोप माता


जगत जननी माता धनोप के रोजाना पुष्प और पत्ती से पुजारी श्रृंगार करते हैं, माते श्री को पोशाक में 9 मीटर का चरना ( घाघरा ) और 9 मीटर की ओढ़नी   ( चुनरी ) और आभूषणों व छत्र से श्रृंगार किया जाता हैं ।

माता के दरबार में भक्त गण अपनी मुराद पुरी होने के लिये पुष्प मांगते है, और माता उनकी मुराद पुरी करती हैं ।

धनोप माता मन्दिर ट्रस्ट द्वारा संचालित है, जिसके अध्यक्ष श्री निर्भय सिंह राणावत व सदस्य 5 मुख्य पुजारी हैं, यह ट्रस्ट देवी स्थान की साफ सफाई, लाईट, पानी, बर्तन सहित भक्त गणो की सभी प्रकार की सहायता करता है ।

 

भैरव प्रतिमा धनोप माता मंदिर

धनोप माता मंदिर में माँ दुर्गा 5 रुप में विराजित हैं ( अन्नपूर्णा, अष्टभुजा, चामुण्डा, बीसभुजा और कालिका  )  मन्दिर में 6 गुम्बद व एक शिखर ऊपरी भाग में स्थित हैं, निज मन्दिर के दाई तरफ ओगड़नाथ व बाई तरफ भगवान शिव अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं । मन्दिर के बाहर माता की सवारी सिंह विराजमान हैं, जो साक्षात सिंह के समान प्रतीत होती हैं ।

कहा जाता है की पृथ्वीराज चौहान कन्नोज के राजा जयचन्द से युद्ध के पश्चात विश्राम के लिये यहां रुके थे, उन्होंने माताराणी के दर्शन किये और यहां सभा भवन का निर्माण करवाया ।

प्रतिवर्ष नवरात्रा में यहाँ माताराणी का विशाल मेला भरता हैं, जिसमें दूर दूर से श्रद्धालु अपनी मुराद लेकर आते हैं, और माताराणी भी खुले मन से उनकी कामना पूर्ण करती हैं । यहां के पुजारी अपने ओसरे ( बारी ) के दौरान दो माह तक अपने घर पर नहीं जाते है, और नियमानुसार हर 2 माह में पुजारी अपने ओसरे के अनुसार बदल जाते हैं ।


 धनोप माताजी का मंदिर सुबह 6 बजे से रात के 9 बजे तक दर्शन के लिए खुला रहता है ।


मेवाड़ धरा के शक्ति पीठों में धनोप माता मंदिर का नाम मुख्य रुप से आता हैं । सभी माता भक्त पोस्ट को शेयर करें ।

धनोप माता भीलवाड़ा


भानगढ़ किला ! भूतों का भानगढ़

भानगढ़ किले का इतिहास

भानगढ़ का किला

भानगढ़ जिसे आम बोलचाल की भाषा में भूतों का किला भी कहा जाता है । जिसका नाम सुनते ही कई लोग डर भी जाते है । इसे भूतों का भानगढ़ भी कहा जाता है ।

भानगढ़ किला अलवर जिले में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के दक्षिण-पश्चिम छोर पर स्थिति है । इस किले का निर्माण आमेर के राजा भगवंत दास ने 1583 में करवाया था । भगवंत दास के छोटे बेटे और मुगल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल मानसिंह के भाई माधोसिंह ने बाद में इसे अपनी रिहाइश बना लिया । माधो सिंह के तीन बेटे थे — ( 1 ) सुजान सिंह ( 2 ) छत्र सिंह ( 3 ) तेज सिंह ।

माधो सिंह के बाद छत्र सिंह भानगढ़ का शासक बना । वर्षो पश्चात महाराजा सवाई जय सिंह ने छत्र सिंह के वारिशों को मारकर भानगढ़ पर अपना अधिकार जमाया ।

भानगढ़ का किला चारदीवारी से घिरा है, जिसके अन्दर प्रवेश करते ही दायीं तरफ कुछ हवेलियों के अवशेष हैं, और सामने की तरफ सड़क के दोनों तरफ कतार में बनायी गयी दुकानों के खण्डहर ।

किले के आखिरी छोर पर तीन मंजिला महल है, जिसकी ऊपरी मंजिल लगभग पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुकी है । भानगढ़ का किला सभी दिशाओं से पहाड़ियों से घिरा हुआ है, जिससे वर्षा ऋतु में यहां की रौनक देखते ही बनती है ।

भानगढ़ किले को दुनियां की सबसे डरावनी जगहों में से एक माना जाता है, और डर का आलम ऐसा है कि आज भी किसी को यहां सूर्योदय से पहले और सुर्यास्त के बाद रुकने की इजाजत नहीं है ।

भानगढ़ का भूतिया किला


प्रचलित किदवंतीयों के अनुसार दो कथाएँ प्रचलित है ।


1. पहली कथा के अनुसार कहा जाता है कि यहां भानगढ़ की राजकुमारी सहित पूरा समाज्य मौत के मुंह में चला गया था । लोगों के कहे अनुसार इसका कारण काला जादू था । और काला जादू करने वाले तांत्रिक के शाप के कारण आज भी यह जगह भूत-प्रेतों से भरी हुई है । 

कहा जाता है कि भानगढ़ कि राजकुमारी रत्नावती बेहद खुबसुरत थी, उस समय उनकी उम्र मात्र 18 वर्ष थी । उस समय उनके रूप की चर्चा पूरे राज्य में थी, और देश के कोने-कोने के राजकुमार उनसे विवाह करने के इच्छुक थे । कई राज्यों से उनके लिए विवाह के प्रस्ताव आ रहे थे । उसी दौरान वो एक बार किले से अपनी सखियों के साथ बाजार घूमने लिए निकली थीं । राजकुमारी रत्नावती एक इत्र की दुकान पर पहुंची और वो इत्रों को हाथों में लेकर उनकी खुशबू ले रही थी । संयोगवश उसी समय उस दुकान से कुछ ही दूरी सिंधु सेवड़ा नाम का व्यक्ति खड़ा था, जो राजकुमारी के सौंदर्य से विभोर होकर राजकुमारी को घूरने लगा । सिंधु सेवड़ा काले जादू का बहुत बड़ा महारथी था । ऐसा बताया जाता है कि वो राजकुमारी के रूप का दिवाना हो गया और राजकुमारी से प्रगाढ़ प्रेम करने लगा था ।

अभवः किसी भी तरह राजकुमारी को हासिल करना चाहता था । इसलिए उसने चुपके से दुकान के पास आकर राजकुमारी को वशीकरण करने के लिए एक इत्र के बोतल में जिसे वो पसंद कर रही थी, उसमें काला जादू कर दिया । लेकिन एक व्यक्ति ने उसे यह सब करते देख लिया और राजकुमारी को इस राज के बारे में बता दिया ।

इसके बाद राजकुमारी रत्नावती ने उस इत्र की बोतल को उठाया, और उसे पास के एक पत्थर पर पटक । पत्थर पर पटकते ही वो बोतल टूट गई और सारा इत्र उस पत्थर पर बिखर गया । इत्र में किये काले जादू के दुष्प्रभाव से वो पत्थर फिसलते हुए उस तांत्रिक सिंधु सेवड़ा के पीछे चल पड़ा और तांत्रिक को कुचल दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गयी । परंतु मरने से पहले तांत्रिक ने शाप दिया कि इस किले में रहने वालें सभी लोग जल्दी ही मर जायेंगे और वो दोबारा जन्म नहीं ले सकेंगे और ताउम्र उनकी आत्माएं इस किले में भटकती रहेंगी ।

उस तांत्रिक के मौत के कुछ दिनों के बाद ही भानगढ़ और अजबगढ़ के बीच युद्ध हुआ, जिसमें किले में रहने वाले सारे लोग मारे गये । यहां तक की राजकुमारी रत्नावती भी उस शाप से नहीं बच सकी और उनकी भी मौत हो गयी । एक ही किले में एक साथ इतने बड़े कत्लेआम के बाद वहां मौत की चीखें गूंजने लगी और कहा जाता है कि आज भी उस किले में उनकी रूहें घूमती रहती हैं ।

BHANGARH FORT


2 . दूसरी कथा के अनुसार भानगढ किले के नजदीक ही बालूनाथ योगी का तपस्या स्थल था, जि‍सने राजा को इस शर्त पर भानगढ़ के किले को बनाने की सहमति‍ दी थी, कि‍ कि‍ले की परछाई कभी भी मेरी तपस्या स्थल को नहीं छूनी चाहि‍ए, परन्‍तु राजा माधोसिंह के वंशजों ने इस बात पर ध्यान नहीं देते हुए कि‍ले की ऊपरी मंजिलों का निर्माण जारी रखा । इसके बाद एक दिन जब कि‍ले की परछाई तपस्‍या स्थल पर पड़ी तो नाराज योगी बालूनाथ ने भानगढ़ को श्राप देकर ध्वस्त कर दिया, और दुबारा कोई उनकी तपस्या में व्यवधान उत्पन्न न करे इसके लिए उन सभी लोगों की आत्माओं को किले में ही कैद कर दिया । श्री बालूनाथ जी की समाधि अभी भी वहाँ पर मौजूद है ।


भानगढ़ का किला भारतीय पुरातत्व के द्वारा संरक्षित कर दिया गया है, परंतु गौर करने वाली बात यह है कि जहां पुरातत्व विभाग ने हर संरक्षित क्षेत्र में अपने ऑफिस बनवाएं है वहीं इस किले के संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग ने अपना ऑफिस भानगढ़ किले से दूर बनाया है । क्या इसकी वजह भी डर है ?

BHANGARH KA KILA


भानगढ़ किले में जाने का रास्ता


यहां जाने के लिए दौसा रेलवे स्टेशन सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है, यहां से मात्र 28 किलोमीटर की दूरी पर भानगढ़ किला स्थित है । हवाई यात्रा के लिए आपको जयपुर उतारना पड़ेगा, जहां से भानगढ़ किला 72 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ।

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महाराज सुरजमल जाट का इतिहास व जीवनी

 महाराज सुरजमल जाट का इतिहास व जीवनी


महाराजा सूरजमल जाट


राजस्थान की पावन धरा पर जाट जाति की सिनसिनवार गौत्र में जन्मे इस वीर ने अपने पराक्रम और शौर्य के बल पर राजस्थान के साथ-साथ पूरे भारतवर्ष का नाम रोशन किया । राजस्थान में वैसे तो अनेक राजा-महाराजा पैदा हुए, पर आज की कहानी है, इन स्वघोषित महान राजाओं के बीच पैदा हुए महाराजा सूरजमल जाट की, यह इतिहास का वह दौर था, जिसमें अधिकतर “ महान “ राजा महाराजाओं ने अपनी जागीरें बचाने के लिए मुगलों से अपनी बहन-बेटियों के रिश्ते किये । उस दौर में यह जाट बाहुबली अकेला मुगलों से बराबर की टक्कर ले रहा था । इस दौर में महाराज सूरजमल को स्वतंत्र हिन्दू राज्य बनाने के लिए जाना जाता है ।


महाराजा सूरजमल जाट का जन्म 13 फरवरी 1707 को महाराज बदनसिंह के यहाँ हुआ । 


'आखा' गढ गोमुखी बाजी, माँ भई देख मुख राजी.

धन्य धन्य गंगिया माजी, जिन जायो सूरज मल गाजी.

भइयन को राख्यो राजी, चाकी चहुं दिस नौबत बाजी.'


वह राजा बदनसिंह के पुत्र थे. महाराजा सूरजमल कुशल प्रशासक, दूरदर्शी और कूटनीति के धनी सम्राट थे. सूरजमल किशोरावस्था से ही अपनी बहादुरी की वजह से ब्रज प्रदेश में सबके चहेते बन गये थे. सूरजमल ने सन 1733 में भरतपुर रियासत की स्थापना की थी.


सूरजमल के शौर्य गाथाएं


राजा सूरजमल का जयपुर रियासत के महाराजा जयसिंह से अच्छा रिश्ता था. जयसिंह की मृत्यु के बाद उसके बेटों ईश्वरी सिंह और माधोसिंह में रियासत के वारिश बनने को लेकर झगड़ा शुरु हो गया. सूरजमल बड़े पुत्र ईश्वरी सिंह को रियासत का अगला वारिस बनाना चाहते थे, जबकि उदयपुर रियासत के महाराणा जगतसिंह छोटे पुत्र माधोसिंह को राजा बनाने के पक्ष में थे. इस मतभेद की स्थिति में गद्दी को लेकर लड़ाई शुरु हो गई. मार्च 1747 में हुए संघर्ष में ईश्वरी सिंह की जीत हुई. लड़ाई यहां पूरी तरह खत्म नहीं हुई. माधोसिंह मराठों, राठोड़ों और उदयपुर के सिसोदिया राजाओं के साथ मिलकर वापस रणभूमि में आ गया. ऐसे माहौल में राजा सूरजमल अपने 10,000 सैनिकों को लेकर रणभूमि में ईश्वरी सिंह का साथ देने पहुंच गये.


सूरजमल को युद्ध में दोनों हाथो में तलवार ले कर लड़ते देख राजपूत रानियों ने उनका परिचय पूछा तब सूर्यमल्ल मिश्र ने जवाब दिया-

'नहीं जाटनी ने सही व्यर्थ प्रसव की पीर, जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर'.

इस युद्ध में ईश्वरी सिंह को विजय प्राप्त हुई और उन्हें जयपुर का राजपाठ मिल गया. इस घटना के बाद महाराजा सूरजमल का डंका पूरे भारत देश में बजने लगा.

महाराजा सूरजमल जाट का साम्राज्य विस्तार


1753 तक महाराजा सूरजमल ने दिल्ली और फिरोजशाह कोटला तक अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ा लिया था. इस बात से नाराज़ होकर दिल्ली के नवाब गाजीउद्दीन ने सूरजमल के खिलाफ़ मराठा सरदारों को भड़का दिया. मराठों ने भरतपुर पर चढ़ाई कर दी. उन्होंने कई महीनों तक कुम्हेर के किले को घेर कर रखा. मराठा इस आक्रमण में भरतपुर पर तो कब्ज़ा नहीं कर पाए, बल्कि इस हमले की कीमत उन्हें मराठा सरदार मल्हारराव के बेटे खांडेराव होल्कर की मौत के रूप में चुकानी पड़ी. कुछ समय बाद मराठों ने सूरजमल से सन्धि कर ली.


लोहागढ़ किला

सूरजमल ने अभेद लोहागढ़ किले का निर्माण करवाया था, जिसे अंग्रेज 13 बार आक्रमण करके भी भेद नहीं पाए. मिट्टी के बने इस किले की दीवारें इतनी मोटी बनाई गयी थी कि तोप के मोटे-मोटे गोले भी इन्हें कभी पार नहीं कर पाए. यह देश का एकमात्र किला है, जो हमेशा अभेद रहा.


तत्कालीन समय में सूरजमल के रुतबे की वजह से जाट शक्ति अपने चरम पर थी. सूरजमल से मुगलों और मराठों ने कई मौको पर सामरिक सहायता ली. आगे चलकर किसी बात पर मनमुटाव होने की वजह से सूरजमल के सम्बन्ध मराठा सरदार सदाशिव भाऊ से बिगड़ गए थे..


उदार प्रवृति के धनी


पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों का संघर्ष अहमदशाह अब्दाली से हुआ. इस युद्ध में हजारों मराठा योद्धा मारे गए. मराठों के पास रसद सामग्री भी खत्म चुकी थी. मराठों के सम्बन्ध अगर सूरजमल से खराब न हुए होते, तो इस युद्ध में उनकी यह हालत न होती. इसके बावजूद सूरजमल ने अपनी इंसानियत का परिचय देते हुए, घायल मराठा सैनिकों के लिए चिकित्सा और खाने-पीने का प्रबन्ध किया.


भरतपुर रियासत का विस्तार


उस समय भरतपुर रियासत का विस्तार सूरजमल की वजह से भरतपुर के अतिरिक्त धौलपुर, आगरा, मैनपुरी, अलीगढ़, हाथरस, इटावा, मेरठ, रोहतक, मेवात, रेवाड़ी, गुडगांव और मथुरा तक पहुंच गया था.


युद्ध के मैदान में ही मिली इस वीर को वीरगति

हर महान योद्धा की तरह महाराजा सूरजमल को भी वीरगति का सुख समरभूमि में प्राप्त हुआ. 25 दिसम्बर 1763 को नवाब नजीबुद्दौला के साथ हिंडन नदी के तट पर हुए युद्ध में सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए. उनकी वीरता, साहस और पराक्रम का वर्णन सूदन कवि ने 'सुजान चरित्र' नामक रचना में किया है.


हमारे इतिहास को गौरवमयी बनाने का श्रेय सूरजमल जैसे वीर योद्धाओं को ही जाता है. जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए. ऐसे सच्चे सपूतों को हमेशा वीर गाथाओं में याद किया जाएगा.


मुगलों के आक्रमण का प्रतिकार करने में उत्तर भारत में जिन राजाओं की प्रमुख भूमिका रही है, उनमें भरतपुर (राजस्थान) के महाराजा सूरजमल जाट का नाम बड़ी श्रद्धा एवं गौरव से लिया जाता है। उनका जन्म 13 फरवरी, 1707 में हुआ था। ये राजा बदनसिंह ‘महेन्द्र’ के दत्तक पुत्र थे। उन्हें पिता की ओर से वैर की जागीर मिली थी। वे शरीर से अत्यधिक सुडौल, कुशल प्रशासक, दूरदर्शी व कूटनीतिज्ञ थे। उन्होंने 1733 में खेमकरण सोगरिया की फतहगढ़ी पर हमला कर विजय प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने 1743 में उसी स्थान पर भरतपुर नगर की नींव रखी तथा 1753 में वहां आकर रहने लगे।


महाराजा सूरजमल की जयपुर के महाराजा जयसिंह से अच्छी मित्रता थी। जयसिंह की मृत्यु के बाद उसके बेटों ईश्वरी सिंह और माधोसिंह में गद्दी के लिए झगड़ा हुआ। सूरजमल बड़े पुत्र ईश्वरी सिंह के, जबकि उदयपुर के महाराणा जगतसिंह छोटे पुत्र माधोसिंह के पक्ष में थे। मार्च 1747 में हुए संघर्ष में ईश्वरी सिंह की जीत हुई। आगे चलकर मराठे, सिसौदिया, राठौड़ आदि सात प्रमुख राजा माधोसिंह के पक्ष में हो गये। ऐसे में महाराजा सूरजमल ने 1748 में 10,000 सैनिकों सहित ईश्वरी सिंह का साथ दिया और उसे फिर विजय मिली। इससे महाराजा सूरजमल का डंका सारे भारत में बजने लगा।

भरतपुर साम्राज्य के सिक्के


मई 1753 में महाराजा सूरजमल ने दिल्ली और फिरोजशाह कोटला पर अधिकार कर लिया। दिल्ली के नवाब गाजीउद्दीन ने फिर मराठों को भड़का दिया। अतः मराठों ने कई माह तक भरतपुर में उनके कुम्हेर किले को घेरे रखा। यद्यपि वे पूरी तरह उस पर कब्जा नहीं कर पाये और इस युद्ध में मल्हारराव का बेटा खांडेराव होल्कर मारा गया। आगे चलकर महारानी किशोरी ने सिंधियाओं की सहायता से मराठों और महाराजा सूरजमल में संधि करा दी।


उन दिनों महाराजा सूरजमल और जाट शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर थी। कई बार तो मुगलों ने भी सूरजमल की सहायता ली। मराठा सेनाओं के अनेक अभियानों में उन्होंने ने बढ़-चढ़कर भाग लिया; पर किसी कारण से सूरजमल और सदाशिव भाऊ में मतभेद हो गये। इससे नाराज होकर वे वापस भरतपुर चले गये। 14 जनवरी, 1761 में हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा शक्तियांे का संघर्ष अहमदशाह अब्दाली से हुआ। इसमें एक लाख में से आधे मराठा सैनिक मारे गये। मराठा सेना के पास न तो पूरा राशन था और न ही इस क्षेत्र की उन्हें विशेष जानकारी थी। यदि सदाशिव भाऊ के महाराजा सूरजमल से मतभेद न होते, तो इस युद्ध का परिणाम भारत और हिन्दुओं के लिए शुभ होता।


इसके बाद भी महाराजा सूरजमल ने अपनी मित्रता निभाई। उन्होंने शेष बचे घायल सैनिकों के अन्न, वस्त्र और चिकित्सा का प्रबंध किया। महारानी किशोरी ने जनता से अपील कर अन्न आदि एकत्र किया। ठीक होने पर वापस जाते हुए हर सैनिक को रास्ते के लिए भी कुछ धन, अनाज तथा वस्त्र दिये। अनेक सैनिक अपने परिवार साथ लाए थे। उनकी मृत्यु के बाद सूरजमल ने उनकी विधवाओं को अपने राज्य में ही बसा लिया। उन दिनों उनके क्षेत्र में भरतपुर के अतिरिक्त आगरा, धौलपुर, मैनपुरी, हाथरस, अलीगढ़, इटावा, मेरठ, रोहतक, मेवात, रेवाड़ी, गुड़गांव और मथुरा सम्मिलित थे।


मराठों की पराजय के बाद भी महाराजा सूरजमल ने गाजियाबाद, रोहतक और झज्जर को जीता। वीर की सेज समरभूमि ही है। 25 दिसम्बर, 1763 को नवाब नजीबुद्दौला के साथ हुए युद्ध में गाजियाबाद और दिल्ली के मध्य हिंडन नदी के तट पर महाराजा सूरजमल ने वीरगति पायी। उनके युद्धों एवं वीरता का वर्णन सूदन कवि ने ‘सुजान चरित्र’ नामक रचना में किया है।

Raj Kaushal Portal launched by Rajasthan Government

Raj Kaushal Portal and “Online Shramik Employment Exchange” has been launched by the Rajasthan Goverment. The portal has been developed by the department of Information and Technology (IT) and Rajasthan Skill & Livelihoods Development Corporation (RSLDC). The “Raj Kaushal Portal” aims to improve availability of opportunities for the migrated workers and hence acts as a bridge between industry and labourers.
The portal aims to overcome the labour shortage faced by the industries by making it easier for the workers to get employment who are suffering from livelihood losses. The “Online Shramik Employment Exchange” comprises of data of over 12 lakh migrant workers including registered workers of planning offices and building and other construction boards. It also contains data of more than 53 lakh workers and manpower trained in RSLDC and ITI.

चित्तौड़गढ़ के किले का इतिहास

चित्तौड़गढ़ के किले का इतिहास

चित्तौड़गढ़ दुर्ग

चित्तौड़गढ़ किले का निर्माण मौर्य वंश के राजा चित्रांगद मौर्य ने सातवीं शताब्दी में करवाया था । चित्तौड़गढ़ किला राज्य का सबसे प्राचीनतम दुर्ग है । इसका निर्माण चित्रकूट नामक पहाडी पर किया गया है ।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग अपने सात विशालकाय मुख्य द्वारों के लिए भी प्रसिद्ध है, जो ऊपर चढ़ते समय एक के बाद एक आते हैं, प्रथम द्वार का नाम पाण्डुपोल, दूसरा द्वार भैरवपोल, तीसरा द्वार गणेशपोल, चौथा द्वार लक्ष्मणपोल, पाँचवाँ द्वार जोड़नपोल, छठा द्वार त्रिपोलिया तथा सातवां और आखिरी द्वार रामपोल है ।

महाराणा प्रताप की जीवनी व इतिहास

चित्तौड़गढ़ किले के बारे में प्रचलित कहावत है कि " गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढैया ।"

मुख्य इमारतें जो चित्तौड़गढ़ किले में स्थित है ।

विजय स्तम्भ :- 

विजय स्तम्भ

महाराणा कुम्भा ने महमूद खिलजी के नेतृत्व वाली मालवा और गुजरात की सेनाओं पर विजय के स्मारक के रूप में सन् 1440-1448 के मध्य इसका निर्माण करवाया था, इसीलिए इसका नाम विजय स्तम्भ रखा गया, इसका वास्तुकार जैता था, इसमें पत्थर पर उकेरी गई हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों के कारण इसे हिन्दू देवी देवताओं का अजायबघर भी कहा जाता है । 9 मंजिला विजय स्तम्भ की ऊंचाई 120 फिट है । अंदर की ओर बनी हुई गोलाकार सीढ़ियों से आप ऊपर तक जा सकते हैं ।
कीर्ति स्तम्भ :- 

कीर्ति स्तम्भ का निर्माण भगेरवाल जैन व्यापारी जीजा ने बारहवीं शताब्दी में करवाया था । यह स्मारक जैन सम्प्रदाय के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है । एक बार बिजली गिरने के कारण कीर्ति स्तम्भ क्षतिग्रस्त हो गया था और स्तंभ के शीर्ष की छत्री खंडित हो गई थी जिसे चित्तौड़गढ़ के तत्कालीन महाराणा फ़तेहसिंह जी ने दुरुस्त करवाया था ।
रानी पद्मिनी का महल :- 

किले में स्थित रानी पद्मिनी महल रानी पद्मिनी के साहस और शान की कहानी सुनाता है । महल के पास ही सुंदर कमल का एक तालाब है । यही वह स्थान है जहाँ सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मिनी के प्रतिबिम्ब की एक झलक देखी थी । रानी के शाश्वत सौंदर्य से सुलतान अभिभूत हो गया और उसकी रानी को पाने की इच्छा के कारण अंततः युद्ध हुआ ।

पृथ्वीराज चौहान की जीवनी व इतिहास

चित्तौड़गढ़ किले पर अधिकार :- 

सातवीं शताब्दी में निर्माण के पश्चात सन् 738 में गुहिल वंश के वास्तविक संस्थापक बप्पा रावल ने मौर्यवंश के अंतिम शासक मानमोरी को हराकर यह किला अपने अधिकार में कर लिया, तत्पश्चात मालवा के परमार राजा मुंज ने इसे गुहिलवंशियों से छीनकर अपने राज्य में मिला लिया और 9 वीं से 10 वीं शताब्दी तक परमारों का आधिपत्य रहा ।
सन् 1133 में गुजरात के सोलंकी राजा जयसिंह ने परमार राजा यशोवर्मन को हराकर मालवा के साथ चित्तौड़गढ़ का दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया । सोलंकी राजा अजयपाल को परास्त राजा सामंत सिंह ने सन 1174 में पुनः चित्तौड़गढ़ किले पर गुहिलवंशियों का आधिपत्य स्थापित कर दिया ।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में तीन साके 1303, 1534, 1567-68 में हुए हैं ।

प्रथम साका :- 

सन् 1303 में महाराणा रत्नसिंह की अलाउद्दीन खिलजी से लड़ाई हुई । युद्ध में अलाउद्दीन खिलजी की विजय हुई, इसी समय चित्तौड़गढ़ किले का प्रथम शाका हुआ । अलाउद्दीन ने चित्तौड़गढ़ का किला अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंप दिया जिसने वापसी पर चित्तौड़ का राजकाज कान्हादेव के भाई मालदेव को सौंपा ।
सिसोदिया राजवंश के संस्थापक राणा हम्मीर ने मालदेव से यह किला छीन लिया । हमीर ने अपनी सूझबूझ और योग्यता से शासन करते हुए राज्य का विस्तार किया और चित्तौड़ का गौरव पुनः स्थापित किया ।

द्वितीय साका :- 

यह 1534 ईस्वी में राणा विक्रमादित्य के शासनकाल में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के समय हुआ था। इसमें रानी कर्मवती के नेतृत्व में स्त्रियों ने जौहर किया ।

तृतीय साका :- 

यह 1567 में राणा उदयसिंह के शासनकाल में अकबर के आक्रमण के समय हुआ, जिसमें जयमल और पत्ता के नेतृत्व में चित्तौड़गढ़ की सेना ने मुगल सेना का जमकर मुकाबला किया और स्त्रियों ने जौहर किया था ।

CHITTORGARH


चित्तौड़गढ़ दुर्ग के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें

1. चित्तौड़गढ़ दुर्ग में विजय स्तम्भ, कुम्भा स्वामी मंदिर, कुम्भा के महल, श्रृंगार चंवरी मंदिर, चार दिवारी और सातों द्वारों का निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया था ।
2. चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित जयमल की हवेली का निर्माण महाराजा उदयसिंह ने करवाया था ।
3. भैरव पोल के पास ही वीर कल्ला राठौड़ की छतरी स्थित है ।
4. इस दुर्ग को सभी किलों का सिरमौर कहा जाता है ।
5. चित्तौड़गढ़ दुर्ग गंभीरी और बेड़च नदियों के संगम पर स्थित है ।
6. चित्तौड़गढ़ दुर्ग की समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 1850 फीट है ।
7. चित्तौड़गढ़ की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त होने वाले जयमल और पत्ता की बहादुरी से खुश होकर अकबर ने आगरा के किले के प्रवेश द्वार पर इनकी हाथी पर सवार संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित करवाई ।
8. इस दुर्ग में प्रमुख जल स्त्रोत भीमलत कुंड, रामकुंड व चित्रांगद मोरी तालाब है ।
9. इस दुर्ग में खेती भी की जाती है ।
10. यह राज्य का सबसे बडा दुर्ग है ।
11. माना जाता है कि भीम ने महाभारत काल में अपने घुटने के बल से यहाँ पानी निकाला था ।

पांडुपोल

चित्तौड़गढ़ ! वीरों को पैदा करने वाली वह भूमि है जिसने समूचे भारत के सम्मुख शौर्य, देशभक्ति एवम् बलिदान का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया । यहाँ के असंख्य वीरों ने अपने देश तथा धर्म की रक्षा के लिए प्राणों का बलिदान दिया । यहाँ का कण-कण हमारे शरीर में देशप्रेम की ऊर्जा पैदा करता है । इस वीर प्रसूता भूमि को बार बार नमन । 🙏🙏


पृथ्वीराज चौहान की जीवनी व इतिहास

पृथ्वीराज चौहान की जीवनी व इतिहास


पृथ्वीराज चौहान

पृथ्वीराज चौहान तृतीय का जन्म 1 जून 1163 के दिन चौहान वंश में अजमेर के शासक सोमेश्वर चौहान और कर्पूरदेवी के घर हुआ था । पृथ्वीराज की शिक्षा दिक्षा अजमेर में ही सम्पन्न हुई । यहीं पर उन्होंने युद्धकला और शस्त्र विद्या की शिक्षा अपने गुरु श्री राम जी से प्राप्त की । पृथ्वीराज चौहान छह भाषाओँ में निपुण थे ( संस्कृत, प्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंश भाषा ) । इसके अलावा उन्हें मीमांसा, वेदान्त, गणित, पुराण, इतिहास, सैन्य विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र का भी ज्ञान था । पृथ्वीराज चौहान के राजकवि कवि चंदरबरदाई की काव्य रचना “ पृथ्वीराज रासो ” में उल्लेख किया गया है कि पृथ्वीराज चौहान शब्दभेदी बाण चलाने, अश्व व हाथी नियंत्रण विद्या में निपुण थे ।
पिता सोमेश्वर चौहान की मृत्यु के पश्चात सन 1178 में पृथ्वीराज चौहान का राजतिलक किया गया । पृथ्वीराज चौहान ने राजा बनने के साथ ही दिग्विजय अभियान भी चलाया, जिसमें उन्होंने सन 1178 में भादानक देशीय, सन 1182 में जेजाकभुक्ति शासक को और सन 1183 में चालुक्य वंशीय शासक को पराजित किया ।
चंदरबरदाई रचित पृथ्वीराज रासो में उल्लेख है कि, पृथ्वीराज जब ग्यारह वर्ष के थे, तब उनका प्रथम विवाह हुआ था । तत्पश्चात प्रतिवर्ष उनका एक विवाह होता गया, जब पृथ्वीराज बाईस वर्ष के हुए उनके 12 विवाह हो चुके थे । उसके पश्चात् पृथ्वीराज जब छत्तीस वर्षीय हुए, तह उनका अन्तिम विवाह संयोगिता के साथ हुआ ।

महाराणा प्रताप की जीवनी व इतिहास

चित्तौड़गढ़ के किले का इतिहास

संयोगिता स्वयंवर


PRITHVIRAJ CHAUHAN

मोहम्मद गौरी को तराइन के प्रथम युद्ध में हारने के बाद पृथ्वीराज की अद्भुत वीरता की प्रशंसा चारों दिशाओं में गूंज रही थी, तब संयोगिता ने पृथ्वीराज की वीरता का और सौन्दर्य का वर्णन सुना । उसके बाद वह पृथ्वीराज को प्रेम करने लगी और दूसरी ओर संयोगिता के पिता जयचन्द ने संयोगिता का विवाह स्वयंवर के माध्यम से करने की घोषणा कर दी । जयचन्द ने अश्वमेधयज्ञ का आयोजन किया था और उस यज्ञ के बाद संयोगिता का स्वयंवर होना था । जयचन्द अश्वमेधयज्ञ करने के बाद भारत पर अपने प्रभुत्व की इच्छा रखता था । जिसका पृथ्वीराज ने विरोध किया था । अतः जयचन्द ने पृथ्वीराज को स्वयंवर में आमंत्रित नहीं किया और उसने द्वारपाल के स्थान पर पृथ्वीराज की प्रतिमा स्थापित कर दी ।
दूसरी तरफ जब संयोगिता को पता लगा कि, पृथ्वीराज चौहान स्वयंवर में अनुपस्थित रहेंगे, तब उसने पृथ्वीराज को बुलाने के लिये खत लिखकर दूत को भेजा । जब पृथ्वीराज चौहान को पता चला कि संयोगिता उससे प्रेम करती है तत्काल कन्नौज नगर की ओर प्रस्थान किया ।
कन्नौज पहुँचकर संयोगिता को सूचना दी और वहाँ से भागने का तरीका सुझाया । स्वयंवर काल के समय जब संयोगिता हाथ में वरमाला लिए उपस्थित राजाओं को देख रही थी, तभी उनकी नजर द्वार पर स्थित पृथ्वीराज की मूर्ति पर पड़ी । उसी समय संयोगिता मूर्ति के समीप जाती हैं और वरमाला पृथ्वीराज की मूर्ति को पहना देती हैं । उसी क्षण घोड़े पर सवार पृथ्वीराज राज महल में आते हैं और संयोगिता को ले कर इन्द्रपस्थ ( वर्तमान दिल्ली का भाग ) की ओर निकल पड़े ।

तराइन का प्रथम युद्ध

मुहम्मद गोरी ने सन 1186 में गजनवी वंश के शासक से लाहौर की गद्दी छीन ली और साम्राज्य विस्तार के लिए भारत में प्रवेश की तैयारी करने लगा । सन 1190 तक सम्पूर्ण पंजाब पर मुहम्मद गौरी का अधिकार हो चुका था । गौरी ने तत्कालीन राजधानी भटिंडा को बनाया एयर वहीं से अपना राजकाज चलता था । इधर गौरी का भारत में बढ़ता प्रभाव पृथ्वीराज को चिंतित कर रहा था । पृथ्वीराज चौहान भी पंजाब में चौहान साम्राज्य स्थापित करना चाहता था और गौरी के रहते यह असंभव था । साम्राज्य विस्तार की यह लालसा युद्ध में बदल गई । फलस्वरूप गौरी से निपटने के लिए पृथ्वीराज चौहान अपनी विशाल सेना के साथ पंजाब की ओर रवाना हो । रास्ते में पड़ने वाले किलों हांसी, सरस्वती और सरहिंद के किलों पर पृथ्वीराज चौहान ने अपना अधिकार कर लिया । इसी बीच उसे सूचना मिली कि पीछे से अनहीलवाडा में विद्रोहियों ने विद्रोह कर दिया है । पृथ्वीराज पंजाब से वापस अनहीलवाडा लौटे और विद्रोह को दबाया । इधर गौरी ने आक्रमण करके जीते हुए सरहिंद के किले को पुन: अपने कब्जे में ले लिया ।
विद्रोह को दबाकर जब यह देख कर पृथ्वीराज वापस पंजाब की ओर लौटने लगा, गौरी भी अपनी सेना के साथ आगे बढ़ा । दोनों सेनाओं के बीच सरहिंद के किले के पास तराइन नामक स्थान पर सन 1191 में यह युद्ध लड़ा गया । तराइन के इस पहले युद्ध में गौरी को करारी हार का सामना करना पड़ा । गौरी के सैनिक प्राण बचा कर भागने लगे, पृथ्वीराज की सेना ने 80 मील तक इन भागते तुर्कों का पीछा किया । मोहम्मद गौरी को कैद कर लिया गया परंतु मानवीय धर्म निभाते हुए पृथ्वीराज ने जान बख्श दी । इस विजय से सम्पूर्ण भारतवर्ष में पृथ्वीराज की धाक जम गयी और उनकी वीरता, धीरता और साहस की कहानी सुनाई जाने लगी ।
पृथ्वीराज चौहान कालीन सिक्के

तराइन का द्वितीय युद्ध

पृथ्वीराज चौहान द्वारा 1191 में राजकुमारी संयोगिता का स्वयंवर में से हरण कर कन्नौज से ले जाना राजा जयचंद को बुरी तरह कचोट रहा था और वह बदला लेने की फिराक में था । जब उसे पता चला की मुहम्मद गौरी भी पृथ्वीराज से अपनी पराजय का बदला लेना चाहता है तो उसने गौरी से गठबंधन के लिया । इस सबसे अंजान पृथ्वीराज को जब ये सूचना मिली की गौरी एक बार फिर युद्ध की तैयारियों में जुटा हुआ तो उसने सहयोगी राजपूत राजाओं से सैन्य सहायता का अनुरोध किया, परन्तु संयोगिता के हरण के कारण बहुत से राजपूत राजा पृथ्वीराज के विरोधी बन चुके थे । वे कन्नौज नरेश जयचंद के संकेत पर गौरी के पक्ष में युद्ध करने के लिए तैयार हो गए ।
सन 1192 में एक बार फिर पृथ्वीराज और गौरी की सेना तराइन के क्षेत्र में टकराई । हालांकि इस युद्ध में पृथ्वीराज की ओर से गौरी के मुकाबले दोगुने सैनिक थे । परंतु इस बार गौरी पिछली हार के सबक सीखकर आया था । पृथ्वीराज चौहान की सैन्य ताकत उसके हाथी थे, गौरी के घुड़सवारों ने आगे बढ़कर पृथ्वीराज की सेना के हाथियों को घेर लिया और उन पर बाण वर्षा शुरू कर दी । घायल हाथी घबरा कर पीछे हटे और अपनी ही सेना को रोंदना शुरू कर दिया । इस युद्ध में पृथ्वीराज की हार हुई । पृथ्वीराज चौहान और उसके राज कवि चंदबरदाई को बंदी बना लिया गया । पृथ्वीराज की हार से गौरी का दिल्ली, कन्नौज, अजमेर, पंजाब और सम्पूर्ण भारतवर्ष पर अधिकार हो गया । साथ ही जयचंद को कन्नौज से हाथ धोना पड़ा । इस युद्ध के पश्चात भारत में इस्लामी साम्राज्य स्थापित हो गया ।
PRITHVIRAJ CHAUHAN


पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु ( 11 मार्च 1192 )

पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के सम्बंध में इतिहासकारों के अलग अलग मत है, सबसे प्रचलित मत के अनुसार गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को कैद करने के पश्चात ' इस्लाम ' धर्म स्वीकारने को विवश किया । पृथ्वीराज चौहान और चंदरबरदाई को तरह तरह से शारीरिक यातना दी गई, परन्तु पृथ्वीराज ' इस्लाम ‘ धर्म के अस्वीकार पर दृढ़ संकल्प थे । गौरी ने पृथ्वीराज चौहान की आँखें गर्म सरियों से फुड़वा दी फिर भी इस्लाम कबूलवाने में नाकाम रहा ।  अतः गौरी ने कूटनीति पूर्वक पृथ्वीराज को ' इस्लाम ' स्वीकार कराने हेतु षड्यन्त्र रचा । गौरी ने अपने मंत्री प्रताप सिंह को षड्यंत्रकारी बताकर पृथ्वीराज के समीप जेल में भेजा । प्रताप सिंह का उद्देश्य था कि, किसी भी प्रकार से पृथ्वीराज को ' इस्लाम ' धर्म का स्वीकार करने के लिये तैयार । प्रताप सिंह पृथ्वीराज से मेल मिलाप बढ़ाता रहा । पृथ्वीराज ने प्रताप सिंह पर विश्वास करके उसे अपने मन की व्यथा बताई और कहा कि इस्लाम कबूलने से मरना बेहतर समझूँगा । पृथ्वीराज चौहान ने प्रताप सिंह को अपनी शब्दभेदी बाण की योजना बताई ।
" मैं गौरी का वध करना चाहता हूँ " पृथ्वीराज ने प्रताप सिंह को अपनी योजना समझाते हुए कहा । पृथ्वीराज ने आगे कहा कि “ मैं शब्दभेदी बाण चलाने में माहिर हूँ । तुम किसी तरह मेरी इस विद्या का प्रदर्शन देखने के लिए गौरी को तैयार करो ।“
प्रताप सिंह ने पृथ्वीराज की सहायता करने के स्थान पर गौरी को सारी योजना बता दी । पृथ्वीराज की योजना जब गौरी ने सुनी, तो उसके मन में क्रोध के साथ कौतूहल भी उत्पन्न हुआ । उसने कल्पना भी नहीं कि थी कि कोई भी अंधा व्यक्ति ध्वनि सुनकर लक्ष्य भेदने में सक्षम हो सकता है । गौरी ने शब्दभेदी बाण का प्रदर्शन देखना चाहा ।
पृथ्वीराज चौहान तो पहले ही तैयार था, चंदबरदाई के साथ अखाड़े में पहुंच गए इधर गौरी ने अपने स्थान पर हूबहू अपने जैसी मूर्ति तैयार कर रखवा दी । गौरी ने जब लक्ष्य भेदने का आदेश दिया ।
चंदरबरदाई ने लोहे की मूर्ति को गौरी समझते हुए कहा “ चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण ! ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान !!”
सचमुच नहीं चुका चौहान, पृथ्वीराज ने प्रत्यंचा खेंची और पूरी ताकत से बाण चला दिया । बाण सनसनाता हुआ गौरी रूपी मूर्ति से टकराया और मूर्ति को दो भागों में तोड़ दिया ।
देशद्रोही प्रताप सिंह के कारण पृथ्वीराज का अंतिम प्रयास भी विफल रहा । हसन निजामी के वर्णन अनुसार, उसके पश्चात क्रोधित गौरी ने पृथ्वीराज को मारने का आदेश दिया । उसके पश्चात एक सैनिक ने तलवार से पृथ्वीराज की हत्या कर दी । इस प्रकार अजमेर में पृथ्वीराज की जीवनलीला समाप्त हो गई ।
चित्तौड़गढ़ के किले का इतिहास
महाराणा प्रताप की जीवनी व इतिहास

महाराणा प्रताप की जीवनी व इतिहास

महाराणा प्रताप की जीवनी व इतिहास
महाराणा प्रताप की जीवनी
जन्म
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 के शुभ दिन महाराणा सांगा के पुत्र उदयसिंह एवं महारानी जयवंता बाई के यहाँ राजसमंद जिले में स्थित कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ । हालांकि इतिहासकारों में जन्म स्थान को लेकर मतभेद है, इतिहासकार जेम्स टॉड के अनुसार महाराणा प्रताप सिंह का जन्म मेवाड़ के कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ, जबकि इतिहासकार विजय नाहर के मतानुसार बालक प्रताप का जन्म अपने नाना सोनगरा अखैराज के राजमहलों में हुआ था । महाराणा प्रताप को बचपन में “ कीका “ नाम से बुलाया जाता था ।
28 फरवरी 1572 को पिता उदयसिंह की मृत्यु होने से पूर्व ही उन्होंने अपनी सबसे छोटी रानी धीरबाई ( राणी भटियाणी ) के पुत्र जगमाल सिंह को मेवाड़ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया, जबकि जेष्ठ पुत्र होने के कारण प्रताप सिंह स्वाभाविक रूप से उत्तराधिकारी था । जगमाल सिंह विलासी प्रवर्ति का अयोग्य राजकुमार था इसलिए राज्य के अधिकतर सामंत जगमाल सिंह के बजाय प्रताप सिंह को महाराणा की गद्दी के लिए योग्य उम्मीदवार मानते थे ।
इधर जगमाल सिंह के हाथ में सत्ता आते ही उसके भोग विलास और जनता पर अत्याचार बढ़ने लगे । प्रताप सिंह ने भी छोटे भाई को समझने की कोशिश की परंतु सत्ता के अंधे जगमाल सिंह ने इसे अनदेखा कर दिया । जब जगमाल सिंह की अयोग्यता और अत्याचार हद से बढ़ने लगे तब विवश होकर मेवाड़ के समस्त सरदार एकत्र हुए और प्रताप सिंह को राजगद्दी पर आसीन करवाया । प्रताप सिंह का प्रथम राजतिलक 1 मार्च 1573 के दिन उदयपुर के नजदीक गोगुन्दा नामक गाँव में हुआ, और इसी दिन से प्रताप सिंह, महाराणा प्रताप नाम से जाना जाने लगा । महाराणा प्रताप का शारीरिक सौष्ठव ही उनके दुश्मनों के दिलों में भय पैदा करने में सक्षम था, महाराणा प्रताप साढ़े सात फिट लंबे थे और 110 किलो वजनी थे, युद्ध में जाते समय उनके साथ 80 किलोग्राम का भाला, 208 किलोग्राम की दो तलवारें और 72 किलोग्राम का लोहे का कवच होता था ।
महाराणा प्रताप का रीति रिवाजों के अनुसार द्वितीय राजतिलक कुम्भलगढ़ दुर्ग में किया गया । इधर प्रताप सिंह के राजगद्दी हथियाने के विरोध स्वरूप जगमाल सिंह ने अकबर से मित्रता गांठ ली ।
महाराणा प्रताप के राज्य की राजधानी उदयपुर थी । उन्होंने सन 1568 से 1597 तक शासन किया । उदयपुर पर विदेशी आक्रमणकारियों के संकट को देखते हुए और सामन्तों की सलाह मानकर महाराणा प्रताप ने उदयपुर छोड़कर कुम्भलगढ़ और गोगुंदा के पहाड़ी इलाके को अपना केन्द्र बनाया ।
 महाराणा प्रताप ने अपने जीवनकाल में कुल 16 शादियाँ की थी, जिनसे उनके 17 पुत्र और 5 पुत्रियाँ थी ।
1568 में मुगल सेना द्वारा चित्तौड़गढ़ किले की विकट घेराबंदी के कारण मेवाड़ की उपजाऊ पूर्वी बेल्ट अकबर के नियंत्रण में आ गई । हालाँकि जंगल और पहाड़ी इलाका अभी भी महाराणा के कब्जे में थे । मेवाड़ पर अकबर की नजर इसलिए भी थी क्योंकि वह मेवाड़ से होते हुए के गुजरात के लिए एक स्थिर तलाश कर रहा था ।
महाराणा प्रताप के शासनकाल के समय तक लगभग पूरे उत्तर भारत में मुगल बादशाह अकबर का साम्राज्य, जिसमें अकबर लगातार बढ़ोतरी कर रहा था । मेवाड़ साम्राज्य अकबर के साम्राज्य विस्तार की राह में रोड़ा बना हुआ था । इसके लिए अकबर ने महाराणा प्रताप को अधीनता स्वीकार करने के लिए चार बार प्रताव भेजे ( सितंबर 1572 में जलाल खाँ, मार्च 1573 में मानसिंह, सितंबर 1573 में भगवानदास, दिसंबर 1573 में टोडरमल ) । परंतु हर बार निराश हाथ लगी, महाराणा प्रताप ने मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार करने से लड़ते हुए मरना श्रेष्ठ माना । अकबर ने महाराण को व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत होने का संदेशा भिजवाया परंतु महाराणा ने इनकार कर दिया, तब युद्ध से ही मेवाड जीतना अकबर के लिए जरूरी हो गया था । जिसके परिणाम स्वरूप 18 जून 1576 को हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ ।

हल्दीघाटी का युद्ध ( 18 जून 1576 )
हल्दीघाटी का युद्ध
18 जून 1576 को मुगल बादशाह के साम्राज्य विस्तार की नीति के फलस्वरूप हल्दीघाटी नामक दर्रे के नजदीक मेवाड़ की सेना ( जिसका सेनापति महाराणा प्रताप था ) और मुगलिया साम्राज्य की सेना ( मानसिंह और आसफ खान ) के बीच भीषण युद्ध हुआ । मेवाड़ की ओर से भील सेना के सरदार राणा पूंजा भील थे, जिन्होंने इस युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाया । इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार हकीम खाँ सूरी थे ।
हल्दीघाटी युद्ध में मेवाड़ की सेना में 20 हजार और मुगल सेना में 50 हजार सैनिक थे, फिर भी मेवाड़ के योद्धाओं ने मुगलों को नाकों चने चबवाये । महाराणा प्रताप ने इस युद्ध में अपनी युद्धकला और वीरता का परचम लहराया । जिस ओर उनका घोड़ा चेतक मुँह घुमा लेता उस तरफ दुश्मनों की लाशों के ढेर लग जाते । दुश्मन सेना के लिए महाराणा और चेतक यमराज और उसके भैसे की तरह दिखाई दे रहा था । इस पूरे युद्ध में मेवाड़ की सेना मुगलों पर भारी पड़ रही थी और उनकी रणनीति सफल हो रही थी । महाराणा ने हाथी पर सवार मुगलों के सेनापति मान सिंह पर चेतक से हमला किया । मानसिंह ने हाथी के ऊपर बने हौदे में छुपकर जान बचाई । इस हमले में चेतक को भी गहरी चोटें आई, चेतक युद्ध में महाराणा का अहम साथी था । यह देखकर मुगल सेना युद्ध छोड़कर केवल महाराणा प्रताप को पकड़ने पर आमाद दिखने लगी, तब बींदा के झाला मान ने महाराणा प्रताप का मुकुट स्वयं धारण कर अपने प्राणों का बलिदान दिया और महाराणा प्रताप को युद्धक्षेत्र से निकलकर उनके जीवन की रक्षा की । युद्धक्षेत्र से निकलते समय मुगल सेना ने महाराणा का पीछा किया और एक विशाल नाले को पार करने के पश्चात स्वामिभक्त चेतक की मृत्यु हो गई । इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध अनिर्णित रहा । अकबर ने अपनी विशाल सेना महाराणा प्रताप को जिंदा या मुर्दा लाने के उद्देश्य से भेजी थी, जिसमें वो नाकाम रहा । वहीं महाराणा प्रताप को भी मेवाड़, चित्तौड़, गोगुन्दा, कुम्भलगढ़, उदयपुर आदि इलाके छोड़ने पड़े ।
इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनी ने किया था ।
इस युद्ध के पश्चात महाराणा ने जंगलों में शरण ली और धीरे धीरे अपनी शक्ति बढ़ाने लगे । इस मुसीबत के वक्त पर उनके मित्र और विश्वासपात्र सलाहकार भामाशाह द्वारा महाराणा को अपना सम्पूर्ण धन अर्पित कर दिया गया ।
वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला। 
उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला॥
इस सहयोग से महाराणा में नये उत्साह का संचार हुआ । अगले तीन वर्षों में महाराणा ने पुन: सैन्य शक्ति संगठित कर मुगलों से एक एक कर अधिकांश इलाके छीन लिये । 
हल्दीघाटी का नाला फांदता चेतक

 दिवेर का युद्ध ( मेवाड़ के मैराथन )

महाराणा प्रताप ने धीरे धीरे अपनी शक्ति अर्जित की और अक्टूबर 1582 में दिवेर और छापली के दर्रो के मध्य हुए दिवेर का युद्ध में मुगल सेना को वापस लौटने पर मजबूर कर दिया । यह इतिहास का एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में महाराणा प्रताप को अपने खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई । इस युद्ध के पश्चात महाराणा प्रताप व मुगल सल्तनत के बीच एक लम्बा संघर्ष चला, इसलिए कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध को " मेवाड़ का मैराथन " कहा था |
दिवेर का युद्ध

दिवेर के युद्ध के पश्चात महाराणा प्रताप एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे, उधर अकबर भी अपने साम्राज्य में हो रहे विद्रोहों को दबाने में उलझ गया परिणामस्वरूप मेवाड़ में मुगल साम्राज्य का शिकंजा छूटने लगा । इसका लाभ उठाकर महाराणा प्रताप ने 1585 तक लगभग सम्पूर्ण मेवाड़ पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया । इस लंबे संघर्ष के पश्चात भी मेवाड़ अकबर के हाथों से फिसल गया । महाराणा प्रताप सिंह के डर से ही अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर गया और तब तक वापस नहीं लौटा जब तक की महाराणा के स्वर्ग सिधारने का समाचार नहीं मिला ।
उसके बाद महाराणा प्रताप अपने राज्य की उन्नति में जुट गए, परंतु दुर्भाग्य से 19 जनवरी 1597 को अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई ।



उपसंहार

महाराणा प्रताप के स्वर्गवास के समय अकबर लाहौर में था, जब उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है । अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस प्रकार है -:
अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी !
गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी !!
नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली !
न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली !!
गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी !
निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी !!
अर्थात -:  हे गेहलोत राणा प्रताप सिंह तेरी मृत्यु पर शाह यानी सम्राट ने दांतों के बीच जीभ अपनी दबाई और निःश्वास के साथ आंसू टपकाए । क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया । तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धुरे को बांए कंधे से ही चलाता रहा । तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया । तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा । इसलिए मैं कहता हूँ कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया ।
महाराणा प्रताप को उनके स्वाभिमान, अदम्य साहस, जिजीविषा और कभी हार न मानने वाले जज्बे की वजह से भारतीय इतिहास में सम्मानपूर्वक देखा और पढ़ा जाता है । आज भी महाराणा प्रताप का जीवन चरित्र समस्त भारतीयों के लिए गर्व का विषय है ।
अपनी मातृभूमि की आजादी के लिए अपना जीवन बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके उनके स्वामिभक्त चेतक को शत-शत नमन । 🙏🙏🙏🙏
महाराणा प्रताप