तेजाजी निर्वाण स्थली सुरसुरा

 वीर तेजाजी निर्वाण स्थली सुरसुरा

तेजाजी धाम सुरसुरा


वीर तेजाजी बलिदान स्थल सुरसुरा, अजमेर जिले की किशनगढ़ तहसील में, किशनगढ़ - हनुमानगढ़ मेगा - हाईवे पर किशनगढ़ शहर से उत्तर दिशा में 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । वहीं अजमेर से 40 किलोमीटर उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित है ।

सुरसुरा गांव का इतिहास


तेजाजी के समय में यहाँ विशाल जंगल था, जिसके उत्तर दिशा में 7-8 किलोमीटर की दूरी पर तेजाजी की ननिहाल त्यौद गांव है जबकि उत्तर-पश्चिम दिशा में 25-30 किलोमीटर की दूरी पर तेजाजी की सुसराल पनेर स्थित है । इसी जंगल में तालाब की पाल पर खेजड़ी वृक्ष के नीचे नाग देवता की बाम्बी है, जहां माता रामकुंवरी ( तेजाजी की माता ) नागदेव की पूजा करती थी ।


तेजाजी निर्वाण स्थल धाम सुरसुरा समतल भूमि में बसा है, इसके पश्चिम में जालया मेडिया नामक अरावली पर्वतमाला की पहाड़ी स्थित है, जबकि उत्तर-पश्चिम की तरफ अरावली पर्वत श्रेणी की काबरीया पहाड़ी स्थित है, काबरीया पहाड़ी के पूर्व में, हाइवे से सटी लाछा गुर्जरी द्वारा बड़े-बड़े चौकोर पत्थरों से निर्मित अत्यंत सुंदर प्राचीन बावड़ी बनी हुई है, जिसे लाछां बावड़ी के नाम से जाना जाता है । यहां दो सुंदर और प्राचीन छतरियाँ हैं, जहां आजकल बर्फानी बाबा नमक फक्कड़ साधुबाबा रहता है ।


सुरसुरा के पूर्व में झुमली टेकरी के पास काफी लंबा चौड़ा गोचर जंगल फैला हुआ है । तेजाजी के काल में यहाँ घना जंगल । सुरसुरा के पूर्व तथा दक्षिण में दो विशाल तालाब बने हुए हैं । पश्चिम का तालाब नष्ट प्रायः हो चुका है, उसी तालाब की पाल पर स्थित खेजड़ी के नीचे बासक नाग की बाम्बी थी, वहीं पर आज तेजाजी का विशाल मंदिर बना हुआ है और बासक नाग की बाम्बी आज भी वहीं बनी हुई है और समय समय पर बासक नाग दर्शन भी देते हैं । वर्तमान में सुरसुरा के तीन तरफ जो जंगल है, वह उसी जंगल के अवशेष हैं, जहां कभी लाछां गुर्जरी की गायें चरती थी । वर्तमान सुरसुरा गांव उसी नाग की बाम्बी के चारो तरफ बसा हुआ है ।


लोक कथाओं के अनुसार तेजाजी के देवगति पाने के पश्चात, इसी सुनसान जंगल से एक बार सुर्रा नाम का खाती अपने बैल गाड़ी जोतकर गुजर रहा था । रात्रि हो जाने पर तेजाजी के वीरगति स्थल के पास रात्रि विश्राम के लिए रुका । रात्रि में चोरों द्वारा उसके बैल चुरा लिए गए । लेकिन तेजाजी की कृपा से चोर बैलों को लेकर भागने में सफल नहीं हो सके । सभी चोर रात भर तेजाजी के बलिदान स्थल व काबरिया पहाड़ी के बीच भूलभुलैया के भ्रम में पड़ भटकते रहे । सवेरा होने पर चोर बैलों को लेकर लौटे और सुर्रा खाती को सौपकर क्षमा मांगते हुए चले गए ।

इस घटना के बाद सुर्रा का आस्था और विश्वास तेजाजी के प्रति इतना बढ़ गया कि वह उसी जंगल में बस गया । उसी सुर्रा खाती के नाम पर गाँव का नाम सुरसुरा पड़ा । आम बोलचाल की भाषा में इस गाँव को अब भी सुर्रा ही बोलते हैं ।


वीर तेजाजी मंदिर सुरसुरा

तेजाजी मंदिर सुरसुरा


तेजाजी की वीरगति धाम, सुरसुरा में तेजाजी का बहुत ही सुंदर और भव्य मंदिर बना हुआ है । यह मंदिर उसी स्थान पर है जहां बलिदान के बाद आसू देवासी की अगुआई में पनेर और त्योद के कुछ लोगों के साथ ग्वालों ने तेजाजी का दाह संस्कार किया था । इसी स्थान पर तेजाजी की पत्नी पेमल सती हो गई थी । तेजाजी मंदिर के सामने बहुत बड़ी धर्मशाला बनी हुई है, जिसमें तेजाजी की जीवनी चित्रित की हुई है ।

तेजाजी मंदिर का मूल स्थान जमीन की सतह से 3 - 4 फुट नीचें है । यह जमीन की सतह से नीचा इसलिए है, क्योंकि तेजाजी के बलिदान के समय यहाँ एक छोटा सा तालाब था । उसी तालाब की पाल पर खेजड़ी वृक्ष के नीचे बासक नाग की बाम्बी थी, जो आज भी मौजूद है । तालाब का अंदरूनी भाग तेजाजी का बलिदान स्थल एवं दाह संस्कार स्थल होने से तालाब की पाल को साथ लेते हुये तालाब में ही मंदिर बना दिया गया था ।


तेजाजी मंदिर के गर्भगृह में स्वयंभू प्राचीन प्रतिमा से सटकर नागराज की बाम्बी विद्यमान है । लोगों की दृढ़ आस्था विश्वास मान्यता के अनुसार गेहूं रंगाभ श्वेत नाग के रूप में तेजाजी दर्शन देते हैं तो उनको इसी बाम्बी में प्रवेश कराया जाता है ।


सुरसुरा के निवासी


सुरसुरा में मुख्यतः जाट, माली, गुर्जर, ब्राह्मण, वैष्णव, मेघवाल, रैदास, दर्जी, सुनार, कुम्हार, हरिजन, राजपूत, दमामी, मीणा, खटीक, नाई, आचार्य, बागरिया, मुसलमान, नाई, टेली, पिनारा, बिंजारा आदि जातियाँ निवास करती हैं, जिनमें जाट जाति की बहुलता है । 


तेजाजी मेला सुरसुरा

हर साल भादवा सुदी दशमी जिसे तेजा दशमी भी कहा जाता है, इस दिन वीर तेजाजी का विशाल मेला भरता है, जो 3 दिन चलता है । श्रावण और भादवा माह में दूर-दूर से तेजाजी की ध्वज यात्राएँ आती है, साल भर लाखों यात्री तेजाजी धाम दर्शनों के लिए आते हैं ।

वीर तेजाजी जाट



तेजाजी धाम सुरसुरा

तेजाजी धाम सुरसुरा आने के लिए आप किशनगढ़ रेलवे स्टेशन से बस या टैक्सी से सुरसुरा पहुंच सकते हैं । किशनगढ़ एयरपोर्ट बनने से आप हवाई जहाज से भी आ सकते हैं । किशनगढ़ से तेजाजी धाम की दूरी मात्र 16 किलोमीटर है ।


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लिछमा बाई रो मायरो

 राजस्थानी ऐतिहासिक कथा लिछमा बाई रो मायरो




उस समय की बात है जब भारतवर्ष में मुगल बादशाह का राज था । नागौर में जायल और खिंयाला दो पड़ौसी रियासत हुआ करती थी । जिनमें दो चौधरी ( जाट ) नम्बरदार हुआ करते थे । नाम था गोपाल जी और धर्मो जी । गोपाल जी जायल गांव के बासट गौत्र के जाट और धर्मो जी खिंयाला के बिडियासर जाट । दोनों चौधरी उस समय दिल्ली के बादशाहों के लिए लगान संग्रहण करने का कार्य किया करते थे ।


वे साल में एक बार किसानों से निर्धारित रकम वसूला करते और बादशाह तक पहुंचा दिया करते और बदले में अपनी तनख्वाह ले लिया करते थे ।


हमेशा की तरह इस बार भी दोनों चौधरीयों ने लगान इकट्ठा किया और ऊंटों पर रकम लाद कर बादशाह को सौंप देने दिल्ली के लिए रवाना हुए । रास्ता लम्बा था और चोर-लुटेरों के हमलों से बचने के लिए दोनों ने बंजारों का रूप धारण कर लिया ।


शाम ढलने तक दोनों जयपुर के नजदीक हरमाड़ा नाम के एक गांव तक पहुंचे । दिन भर चलते चलते दोनों थक चुके थे, इसलिए हरमाड़ा गांव के पास चौधरियों ने डेरा जमाया । गोपाल जी तालाब में ऊंटों को पानी पिलाने गए और धर्मोजी पीतल की गगरी लेकर कुवे पर पानी लेने गये ।



दैवयोग से उसी दौरान गांव की गुर्जर जाति की एक सामान्य सी गृहिणी, लिछमा गुर्जरी । अपनी जेठानियों की पुत्रियों के साथ अपनी पुत्री के विवाह के प्रबंध में लगी थी । लेकिन विवाह के उत्साह से बिल्कुल परे वह आकुल, व्याकुल, दुविधाग्रस्त थी । कारण ये था कि पीहर में उसका कोई भाई नहीं था, और माता पिता भी इतने बूढ़े हो चुके थे की जो उसकी पुत्री के विवाह में भात भरने के लिए नहीं आ सकते थे ।


भात या मायरा राजस्थान की प्रथा है जिसमें विवाह के सुअवसर पर मातुल पक्ष के लोग सामर्थ्यानुसार वस्त्र, आभूषण आदि कुछ उपहार ले कर प्रस्तुत होते हैं ।


लेकिन उपहार और सहायता के नाम पर चली ये परम्परा धीरे धीरे प्रतिष्ठा का प्रश्न बन महिलाओं के लिए गले की फांस बन गयी ।

अब हालात ये है कि जब तक मायके से मायरा आ न जाए, तब तक ना तो नारी चिंता मुक्त हो पाती थी और ना ही कुल कुटुम्ब उसे चैन की सांस लेने देते थे । भात में कितने पैसे आए ? कौन कौन से आभूषण आए ? किस भाँति के वस्त्र आए इत्यादि प्रश्नों के उत्तर आने वाले कई दिन-महीनों-सालों तक ससुराल में नारी की प्रतिष्ठा और महत्त्व को निर्धारित करते थे । भात कम आने का अर्थ ही जहाँ जीवन भर सास-ननद, देवरानी-जेठानी आदि के ताने हुआ करता हो, वहाँ भात नहीं आने पर क्या हाल हो सकता है ? कल्पना सहज ही की जा सकती है ।


अगले दिन विवाह का कार्यक्रम निश्चित था । जेठानीयों की पुत्रियों का भी विवाह था । उनका भी भात कल ही आना था, वे दोनों अपने अपने पिता-भाई और भात के स्वागत का प्रबंध कर रही थीं ।


ऐसे में लिछमा स्वयं को दुर्भाग्यशाली न समझे तो क्या करे । मां के जाए बीर बिना कुण भात भरण ने आवे ! आंसू आंखों की कोर में तैर रहे थे, छलके नहीं । क्योंकि अभी तक इस प्रसंग पर चर्चा हुई नहीं थी । लिछमा को लगा- मेरे मायके की स्थिति सर्वज्ञात है, हो सकता है इसी से मुझे मायरे से मुक्ति दे दी गई हो ।


लेकिन ऐसा थोड़े ही हुआ करता है । पंजाब में कहावत है- सांप में एक 'स', सास में दो 'स', सास ये मौका ऐसे ही थोड़े छोड़ देने वाली थी । सास समुदाय की प्राचीन एवं प्रचलित परम्परा का पूर्ण रूपेण निर्वहन । खुल कर तिक्त वचन सुनाए गए । भात बिना कोई विवाह हुआ है कभी जो तेरी बेटी का हो जाएगा, फूटे भाग हमारे जो तेरे जैसी बहु मिली, मर क्यों नहीं जाती कहीं जाकर !


अपमान के नमक से अंतर के घाव चिरमिरा उठे । लिछमा रोने लगी । मन में विचार आया-तिरस्कार सह कर जीने से तो अच्छा प्राण ही दे दिए जाएं । कौनसा सार बचा है जीवन में ।


पनघट से पानी लाने का बहाना बनाया, घड़ा उठाया और रोते रोते चल पड़ी । लिछमा पनघट पर बैठ के खुल के रोई, सोचा- मरना तो है ही, जी तो हल्का करूँ । राम जाने विधाता ने कैसे भाग लिखे हैं, जो कोई मेरा भी भाई होता तो आज मरने की नौबत थोड़े ही आती ।


और भाग्यवश, दैव योग से ही, लिछमा का रुदन पानी भरने आये धर्मो चौधरी के कानों में पड़ा । चौधरी रुदन सुन चौंका । सूर्य पश्चिम में ढल चुका है और रात्रि का अँधेरा गहराने लगा और ऐसे समय में पनघट के नजदीक स्त्री कण्ठ से रुदन की ध्वनि ? यह कौन दुखियारी है ?

धर्मोजी उठे और रुदन की आवाज सुनते हुए लिछमा तक पहुंचे और बोले “ पणिहारी ! रोती क्यों है ? कौन विपत्ति आन पड़ी ? मुझे बता, शायद मैं कुछ सहायता कर सकूँ ?


लिछमा ने सोचा इसे सुना कर ही क्यों न मरूँ, मरना तो है ही, जी तो हल्का हो । लिछमा ने चौधरी को सब कुछ कह सुनाया । चौधरी साहब व्यथा सुन व्याकुल हो गए और बोले- “ पणिहारी, कौन कहता है तेरा कोई भाई नहीं है, मुझे राखी बांध, मैं तेरा भाई हूँ ।“


लिछमा हिचकिचाई, चौधरी फिर बोला - लिछमा, चीर फाड़ के बांध कलाई पर, मैं तेरा धर्म का भाई हूँ । अब से तेरा सम्मान मेरा सम्मान । तेरी लाज मेरी लाज । तेरी व्यथा - मेरी व्यथा । भात की चिंता मत कर । भात मैं भरूँगा ।


चौधरी की जबान थी, लिछमा आश्वस्त हो गई ।



लिछमा के ओढ़नी के टुकड़े ने चौधरी की कलाई पर बन्ध कर भाई बहन के रिश्ते की नींव पड़ने की साख भरी । गूजरी दुःख की घड़ी में भाई का सा स्नेह पा बड़ी प्रसन्न हुई और घड़ा उठा घर की ओर चली ।

घर पहुंचने पर जब सास-ननद, जेठानी-देवरानी ने विष बुझे वचन शरों का वर्षण किया तब लिछमा ने आप बीती बताई और बोला कि सुबह मेरा भी धर्मभाई भात लेकर आने वाला है ।

लिछमा की बातें सुन सभी ने मजाक उड़ाया और बोला कि वो तो बंजारे है, उन्होंने तुम्हें बेवकूफ बनाया है, और सुबह तक यहाँ से चले भी जायेंगे । ऐसे कोई राह चलता किसी का माहिरा भरता है भला ?

लिछमा के पति ने भी उसे समझाया कि ऐसा नहीं होता और यदि उन बंजारों के पास ही माहिरा भरने के रुपये होते तो घरबार छोड़कर क्यों घूम रहे होते ? देखना सुबह तक वो अपनी राह पर आगे निकल जायेंगे ।


लेकिन लिछमा तो मन ही मन मुदित थी, प्रमुदित थी सो सब झेलती रही ।


उधर, धर्मोजी ने गोपालजी को सारा वृत्तांत सुनाया और कहा - वचन दे आया हूँ, सुबह भात भरना है । दूसरा चौधरी जबान की कीमत समझता था, भात भरने का कह दिया, मतलब भात तो भरना ही है ।


लेकिन, पैसे कहाँ से आएं ? ऊंटों पर जो रकम लदी है, वो तो मालगुजारी के पैसे हैं । बादशाह की अमानत। भारतवर्ष पर एकछत्र राज करने वाले बादशाह की अमानत और इस अमानत में खयानत करना यानी अपनी मौत को आमन्त्रित करना । रकम भी कोई छोटी मोटी नहीं थी, पूरी 22000 सोने अशर्फियाँ । ये खर्च करने पर बादशाह ज़िंदा तो नहीं छोड़ेगा । ये तो तय है । क्या किया जाए ?

लेकिन, वचन देकर पलट जायें, इससे अच्छा तो यही कि गर्दन कट जाये । हम वीर तेजाजी के वंशज है, “ प्राण जाय पर वचन न जाई “ भात तो भरेंगे । बादशाह जो करेगा, देखा जाएगा ।


चौधरियों ने रातों रात खूंटों से बंधे ऊंटों को खोला, सवार हुए और घण्टे भर में जा पहुंचे जयपुर । कुछ पुरानी पहचान और कुछ अशर्फियों की खनक ने आधी रात में दो चार दुकानें खुलवाई और मायरे के लिए उपहार, वस्त्र और आभूषण खरीदे और भोर होते होते पुनः हरमाड़ा पहुंच गए ।

सुबह, जब बात गांव भर में फैली कि लिछमा के धर्म भाई आए हैं और भात भी भरा जाएगा तो इसे मजाक समझ देवरानी जेठानी ने मुंह बनाया । कल तक तो कोई भाई न था । अब कौन कृष्ण भगवान भात भरने आ रहे हैं ।

खुशी से फूली न समाती लिछमा, पूरे परिवार के साथ गांव के बाहर धर्मोजी और गोपाल जी का स्वागत करने पहुँची । धर्मोजी और गोपाल जी दो कपड़ो के थानों से लदी बैलगाड़ियों के साथ गांव के बाहर खड़े थे ।

धर्मोजी ने बाई लिछमा को चुन्दड़ी ओढाई और ढोल नगाड़ों के साथ गांव में प्रवेश किया ।

पूरे गांव में लिछमा गुर्जरी और उसके दोनों चौधरी भाईयों की बातें होने लगी । इधर लिछमा की दोनों जेठानियाँ जल-भूनकर काली पड़ गई । दोनों ने आपस में मन्त्रणा की और निश्चय किया कि किसी भी तरह दोनों चौधरियों को लिछमा का माहिरा नहीं भरने देना है वरना उनका नाक कट जायेगा ।

जेठानियों ने अपने पतियों को पिरोया और उन्हीं की अंगुलियों पर नाचते दोनों जेठ और ससुर, गांव के पंचो के साथ चौधरियों के पास पहुँच गए ।

“ चौधरियों ! लिछमा का माहिरा लेकर तो आप आ गए । लेकिन हमारे गांव में माहिरा भरने के कुछ नियम है वो तो आपको मानने पड़ेंगे ।“ पंच ने लिछमा के जेठों ने जैसा सिखाया था बोलना शुरू किया

“ देखो पांचों ! हम बाई लिछमा का माहिरा भरने आये हैं तो माहिरा तो भरके जायेंगे ।“ गोपाल जी ने मुछ मरोड़ते हुए कहा “ अब आपके यहाँ जो भी नियम है बता दीजिए ।“

“ हमारे यहाँ जो भी माहिरा भरने आता है उसको ढोली, नाई, कमीणा को नेग में बेस देना पड़ता है ।“ पंच ने कहा

“ पंचो ! ढोली– नाई छोड़ो, आप तो पूरे गांव के ही घर बता दो कितने है ?” धर्मोजी ने कहा

पंच समझ गये की ये तो माहिरा भरे बिना नहीं जाने वाले ।

यह खबर जब वापस देवरानी, जेठानी के कानों पहुँची तो दोनों मिलकर अपने भाइयों के पास गई और बोली कि भले दो दोनों मिलकर माहिरा भर देना परंतु इन चौधरियों से पीछे नहीं रहना है ।



शाम के समय माहिरा भरने लगा ।

दोनों चौधरियों ने पूरे गाँव के घर घर में कपड़े पहनाये, लिछमा गुर्जरी को नोरंगी चुनरी ओढ़ाई और उपहारों से घर भर दिया ।

इधर लिछमा की देवरानी जेठानी के भाईयों ने मिलकर सौ चांदी की मोहरें माहिरा में भरी । चौधरियों ने बची हुई बिस हजार सोने की अशर्फियाँ थाली में भर दी । पूरे गाँव में दोनों चौधरियों की जय जयकार होने लगी । पूरे कुल कुटुम्ब के बीच लिछमा नौरंगी चूनरी ओढ़े खड़ी थी । भाव विह्वल । एक सूत्र की शक्ति, एक धागे की ताकत संसार देख रहा था । अज्ञात कुल, नाम, ग्राम की नारी, जिसे कल तक देखा तक न था, उसके हाथों रक्षा सूत्र बन्ध जाने के बाद, उसके सम्मान की रक्षा की खातिर चौधरी बादशाह तक को चुनौती दे बैठे । रक्षा सूत्र से बंधे भाईयों ने बहन के सम्मान की रक्षा की और भात में दोनों ऊँटों सहित सारी माया लुटा, हाथ जोड़, चौधरी दिल्ली को निकल पड़े ।


दो चार दिन बाद दिल्ली पहुंचे, दरबार में हाजरी लगाई । मालगुजारी जमा करवाने के वक़्त बादशाह के सम्मुख हाथ जोड़ खड़े हो गए । पूरा वृत्तांत कह सुनाया । मौत का भय तो था ही नहीं, मरना तो निश्चित मान के गए थे ।

लेकिन- "हिम्मत कीमत होय, बिन हिम्मत कीमत नहीं ।" "कर भला तो हो भला।"

बादशाह घटना सुन कर और चौधरियों की हिम्मत देख कर प्रभावित हो गया । उसने घटना की सत्यता जांचने का हुक्म दिया और सत्यता प्रमाणित होते ही दोनों चौधरियों को पुरस्कृत भी किया ।

दोनों चौधरी बादशाह के यहां से 1000 बीघा जमीन पुरस्कार में प्राप्त कर खुशी खुशी घर लौटे और हजार बीघा जमीन के साथ ही कमा लाए- हजारों वर्षों के लिए नाम ।

राजस्थान में आज तक बहनें अपने भाईयों से उन चौधरियों की तरह बनने को कहा करती है । वचन के पक्के, निडर, हिम्मती और दरियादिल । आज भी रक्षा बंधन के और भात के गीतों में ये पंक्तियां गाई जाती हैं-

" बीरा बणजे तू जायल रो जाट ।

बणजे खिंयाला रो चौधरी ।।“

ढोली व डूम भी गाँव गाँव इस गाथा का बखान करते हुए गाते है " खिंयाला रा चौधरी बडियासर बंका, न मानी राज की शंका ।"

आज भी खिंयाला के जाट इस परंपरा का निर्वाह करते है । “ यदि किसी स्त्री के पीहर में कोई माहिरा भरने वाला नहीं है और वह स्त्री खिंयाला जाकर माहिरा का न्यौता देती है, भले ही स्त्री किसी भी जाति की हो । खिंयाला के जाट सब शामिल होकर उस औरत के ससुराल जाकर माहिरा भरकर आते हैं ।



धनोप माता मंदिर की जानकारी व इतिहास

धनोप माता मंदिर की जानकारी व इतिहास

धनोप माता मंदिर, धनोप भीलवाड़ा


यदि आप भीलवाड़ा के धनोप माता मंदिर के दर्शन और इसके पर्यटक स्थल की जानकारी लेना चाहते हैं तो हमारे इस लेख को पूरा जरूर देखें जिसमें हम आपको धनोप माता मंदिर का इतिहास, दर्शन का समय और यात्रा से जुड़ी अन्य महत्वपूर्ण जानकारी के बारे में बताने वाले है –

मेवाड के शक्तिपीठो में एक प्राचीन शक्तिपीठ धनोप माता का मन्दिर भीलवाड़ा से 80 किलोमीटर की दूरी पर है, यह दिल्ली मुम्बई मेगा हाईवे व बिजयनगर -गुलाबपुरा रेलवे स्टेशन से 30 किलोमीटर की दूरी पर धनोप नामक एक छोटे से गांव में स्थित एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर है ।

 

संगरिया गांव से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित शीतला माता को समर्पित धनोप माता मंदिर राजस्थान राज्य के प्रमुख मंदिर में से एक है, जहाँ हर साल बड़ी संख्या में भक्त शीतला माता के दर्शन के लिए आते है । इस मंदिर की वास्तुकला भी काफी आकर्षक है जो इसके अन्य आकर्षण के रूप में कार्य करती है ।

धनोप माता मंदिर एक ऊंचे टीले पर बना हुआ है, जो बेहद प्राचीन प्राकृतिक संरचना है । इस मंदिर में विक्रम संवत 912 भादवा सुदी 2 का शिलालेख भी उपस्थित है, जिससे इस बात का पता चला है कि यह मंदिर लगभग 1100 साल पुराना है । माता का मंदिर धनोप गाँव में स्थित है जिसकी वजह से इस मंदिर को धनोप माता मंदिर कहा जाता है । माना जाता है कि प्राचीन काल में धनोप एक समृद्ध नगर था जिसमें कई सुंदर मंदिर, भवन, बावड़ियाँ, कुण्ड बने थे । इस नगर में दोनों तरफ मानसी और खारी नदी बहती थी, जिनके अवशेष आज भी विद्यमान है । प्राचीन काल में यह नगर राजा धुंध की नगरी थी जिसे “ ताम्बवती ” नगरी भी बोला जाता था ।

आपको बता दें कि राजा के नाम से ही इस जगह का नाम धनोप पड़ा था । धनोपमाता राजा की कुल देवी थी । धनोप माता मंदिर में अन्नपूर्णा, चामुण्डा और कालिका माता की खूबसूरत मूर्ति स्थापित है जिनका मुख पूर्व दिशा की ओर है । इनके अलावा यहां पर भैरु जी का स्थान भी है और शिव-पार्वती, कार्तिकेय, गणेश व चौंसठ योगिनियों की मूर्तियाँ भी है । वैसे तो माता के दर्शन के लिए रोजाना हजारों तीर्थ यात्री आते हैं लेकिन नवरात्रा के दौरान यहां धनोप माता का मेला भी लगता है जिसमें लाखों की संख्या में यात्री शामिल होते हैं ।

धनोप माता


जगत जननी माता धनोप के रोजाना पुष्प और पत्ती से पुजारी श्रृंगार करते हैं, माते श्री को पोशाक में 9 मीटर का चरना ( घाघरा ) और 9 मीटर की ओढ़नी   ( चुनरी ) और आभूषणों व छत्र से श्रृंगार किया जाता हैं ।

माता के दरबार में भक्त गण अपनी मुराद पुरी होने के लिये पुष्प मांगते है, और माता उनकी मुराद पुरी करती हैं ।

धनोप माता मन्दिर ट्रस्ट द्वारा संचालित है, जिसके अध्यक्ष श्री निर्भय सिंह राणावत व सदस्य 5 मुख्य पुजारी हैं, यह ट्रस्ट देवी स्थान की साफ सफाई, लाईट, पानी, बर्तन सहित भक्त गणो की सभी प्रकार की सहायता करता है ।

 

भैरव प्रतिमा धनोप माता मंदिर

धनोप माता मंदिर में माँ दुर्गा 5 रुप में विराजित हैं ( अन्नपूर्णा, अष्टभुजा, चामुण्डा, बीसभुजा और कालिका  )  मन्दिर में 6 गुम्बद व एक शिखर ऊपरी भाग में स्थित हैं, निज मन्दिर के दाई तरफ ओगड़नाथ व बाई तरफ भगवान शिव अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं । मन्दिर के बाहर माता की सवारी सिंह विराजमान हैं, जो साक्षात सिंह के समान प्रतीत होती हैं ।

कहा जाता है की पृथ्वीराज चौहान कन्नोज के राजा जयचन्द से युद्ध के पश्चात विश्राम के लिये यहां रुके थे, उन्होंने माताराणी के दर्शन किये और यहां सभा भवन का निर्माण करवाया ।

प्रतिवर्ष नवरात्रा में यहाँ माताराणी का विशाल मेला भरता हैं, जिसमें दूर दूर से श्रद्धालु अपनी मुराद लेकर आते हैं, और माताराणी भी खुले मन से उनकी कामना पूर्ण करती हैं । यहां के पुजारी अपने ओसरे ( बारी ) के दौरान दो माह तक अपने घर पर नहीं जाते है, और नियमानुसार हर 2 माह में पुजारी अपने ओसरे के अनुसार बदल जाते हैं ।


 धनोप माताजी का मंदिर सुबह 6 बजे से रात के 9 बजे तक दर्शन के लिए खुला रहता है ।


मेवाड़ धरा के शक्ति पीठों में धनोप माता मंदिर का नाम मुख्य रुप से आता हैं । सभी माता भक्त पोस्ट को शेयर करें ।

धनोप माता भीलवाड़ा


भानगढ़ किला ! भूतों का भानगढ़

भानगढ़ किले का इतिहास

भानगढ़ का किला

भानगढ़ जिसे आम बोलचाल की भाषा में भूतों का किला भी कहा जाता है । जिसका नाम सुनते ही कई लोग डर भी जाते है । इसे भूतों का भानगढ़ भी कहा जाता है ।

भानगढ़ किला अलवर जिले में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान के दक्षिण-पश्चिम छोर पर स्थिति है । इस किले का निर्माण आमेर के राजा भगवंत दास ने 1583 में करवाया था । भगवंत दास के छोटे बेटे और मुगल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल मानसिंह के भाई माधोसिंह ने बाद में इसे अपनी रिहाइश बना लिया । माधो सिंह के तीन बेटे थे — ( 1 ) सुजान सिंह ( 2 ) छत्र सिंह ( 3 ) तेज सिंह ।

माधो सिंह के बाद छत्र सिंह भानगढ़ का शासक बना । वर्षो पश्चात महाराजा सवाई जय सिंह ने छत्र सिंह के वारिशों को मारकर भानगढ़ पर अपना अधिकार जमाया ।

भानगढ़ का किला चारदीवारी से घिरा है, जिसके अन्दर प्रवेश करते ही दायीं तरफ कुछ हवेलियों के अवशेष हैं, और सामने की तरफ सड़क के दोनों तरफ कतार में बनायी गयी दुकानों के खण्डहर ।

किले के आखिरी छोर पर तीन मंजिला महल है, जिसकी ऊपरी मंजिल लगभग पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुकी है । भानगढ़ का किला सभी दिशाओं से पहाड़ियों से घिरा हुआ है, जिससे वर्षा ऋतु में यहां की रौनक देखते ही बनती है ।

भानगढ़ किले को दुनियां की सबसे डरावनी जगहों में से एक माना जाता है, और डर का आलम ऐसा है कि आज भी किसी को यहां सूर्योदय से पहले और सुर्यास्त के बाद रुकने की इजाजत नहीं है ।

भानगढ़ का भूतिया किला


प्रचलित किदवंतीयों के अनुसार दो कथाएँ प्रचलित है ।


1. पहली कथा के अनुसार कहा जाता है कि यहां भानगढ़ की राजकुमारी सहित पूरा समाज्य मौत के मुंह में चला गया था । लोगों के कहे अनुसार इसका कारण काला जादू था । और काला जादू करने वाले तांत्रिक के शाप के कारण आज भी यह जगह भूत-प्रेतों से भरी हुई है । 

कहा जाता है कि भानगढ़ कि राजकुमारी रत्नावती बेहद खुबसुरत थी, उस समय उनकी उम्र मात्र 18 वर्ष थी । उस समय उनके रूप की चर्चा पूरे राज्य में थी, और देश के कोने-कोने के राजकुमार उनसे विवाह करने के इच्छुक थे । कई राज्यों से उनके लिए विवाह के प्रस्ताव आ रहे थे । उसी दौरान वो एक बार किले से अपनी सखियों के साथ बाजार घूमने लिए निकली थीं । राजकुमारी रत्नावती एक इत्र की दुकान पर पहुंची और वो इत्रों को हाथों में लेकर उनकी खुशबू ले रही थी । संयोगवश उसी समय उस दुकान से कुछ ही दूरी सिंधु सेवड़ा नाम का व्यक्ति खड़ा था, जो राजकुमारी के सौंदर्य से विभोर होकर राजकुमारी को घूरने लगा । सिंधु सेवड़ा काले जादू का बहुत बड़ा महारथी था । ऐसा बताया जाता है कि वो राजकुमारी के रूप का दिवाना हो गया और राजकुमारी से प्रगाढ़ प्रेम करने लगा था ।

अभवः किसी भी तरह राजकुमारी को हासिल करना चाहता था । इसलिए उसने चुपके से दुकान के पास आकर राजकुमारी को वशीकरण करने के लिए एक इत्र के बोतल में जिसे वो पसंद कर रही थी, उसमें काला जादू कर दिया । लेकिन एक व्यक्ति ने उसे यह सब करते देख लिया और राजकुमारी को इस राज के बारे में बता दिया ।

इसके बाद राजकुमारी रत्नावती ने उस इत्र की बोतल को उठाया, और उसे पास के एक पत्थर पर पटक । पत्थर पर पटकते ही वो बोतल टूट गई और सारा इत्र उस पत्थर पर बिखर गया । इत्र में किये काले जादू के दुष्प्रभाव से वो पत्थर फिसलते हुए उस तांत्रिक सिंधु सेवड़ा के पीछे चल पड़ा और तांत्रिक को कुचल दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गयी । परंतु मरने से पहले तांत्रिक ने शाप दिया कि इस किले में रहने वालें सभी लोग जल्दी ही मर जायेंगे और वो दोबारा जन्म नहीं ले सकेंगे और ताउम्र उनकी आत्माएं इस किले में भटकती रहेंगी ।

उस तांत्रिक के मौत के कुछ दिनों के बाद ही भानगढ़ और अजबगढ़ के बीच युद्ध हुआ, जिसमें किले में रहने वाले सारे लोग मारे गये । यहां तक की राजकुमारी रत्नावती भी उस शाप से नहीं बच सकी और उनकी भी मौत हो गयी । एक ही किले में एक साथ इतने बड़े कत्लेआम के बाद वहां मौत की चीखें गूंजने लगी और कहा जाता है कि आज भी उस किले में उनकी रूहें घूमती रहती हैं ।

BHANGARH FORT


2 . दूसरी कथा के अनुसार भानगढ किले के नजदीक ही बालूनाथ योगी का तपस्या स्थल था, जि‍सने राजा को इस शर्त पर भानगढ़ के किले को बनाने की सहमति‍ दी थी, कि‍ कि‍ले की परछाई कभी भी मेरी तपस्या स्थल को नहीं छूनी चाहि‍ए, परन्‍तु राजा माधोसिंह के वंशजों ने इस बात पर ध्यान नहीं देते हुए कि‍ले की ऊपरी मंजिलों का निर्माण जारी रखा । इसके बाद एक दिन जब कि‍ले की परछाई तपस्‍या स्थल पर पड़ी तो नाराज योगी बालूनाथ ने भानगढ़ को श्राप देकर ध्वस्त कर दिया, और दुबारा कोई उनकी तपस्या में व्यवधान उत्पन्न न करे इसके लिए उन सभी लोगों की आत्माओं को किले में ही कैद कर दिया । श्री बालूनाथ जी की समाधि अभी भी वहाँ पर मौजूद है ।


भानगढ़ का किला भारतीय पुरातत्व के द्वारा संरक्षित कर दिया गया है, परंतु गौर करने वाली बात यह है कि जहां पुरातत्व विभाग ने हर संरक्षित क्षेत्र में अपने ऑफिस बनवाएं है वहीं इस किले के संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग ने अपना ऑफिस भानगढ़ किले से दूर बनाया है । क्या इसकी वजह भी डर है ?

BHANGARH KA KILA


भानगढ़ किले में जाने का रास्ता


यहां जाने के लिए दौसा रेलवे स्टेशन सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है, यहां से मात्र 28 किलोमीटर की दूरी पर भानगढ़ किला स्थित है । हवाई यात्रा के लिए आपको जयपुर उतारना पड़ेगा, जहां से भानगढ़ किला 72 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ।

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महाराज सुरजमल जाट का इतिहास व जीवनी

 महाराज सुरजमल जाट का इतिहास व जीवनी


महाराजा सूरजमल जाट


राजस्थान की पावन धरा पर जाट जाति की सिनसिनवार गौत्र में जन्मे इस वीर ने अपने पराक्रम और शौर्य के बल पर राजस्थान के साथ-साथ पूरे भारतवर्ष का नाम रोशन किया । राजस्थान में वैसे तो अनेक राजा-महाराजा पैदा हुए, पर आज की कहानी है, इन स्वघोषित महान राजाओं के बीच पैदा हुए महाराजा सूरजमल जाट की, यह इतिहास का वह दौर था, जिसमें अधिकतर “ महान “ राजा महाराजाओं ने अपनी जागीरें बचाने के लिए मुगलों से अपनी बहन-बेटियों के रिश्ते किये । उस दौर में यह जाट बाहुबली अकेला मुगलों से बराबर की टक्कर ले रहा था । इस दौर में महाराज सूरजमल को स्वतंत्र हिन्दू राज्य बनाने के लिए जाना जाता है ।


महाराजा सूरजमल जाट का जन्म 13 फरवरी 1707 को महाराज बदनसिंह के यहाँ हुआ । 


'आखा' गढ गोमुखी बाजी, माँ भई देख मुख राजी.

धन्य धन्य गंगिया माजी, जिन जायो सूरज मल गाजी.

भइयन को राख्यो राजी, चाकी चहुं दिस नौबत बाजी.'


वह राजा बदनसिंह के पुत्र थे. महाराजा सूरजमल कुशल प्रशासक, दूरदर्शी और कूटनीति के धनी सम्राट थे. सूरजमल किशोरावस्था से ही अपनी बहादुरी की वजह से ब्रज प्रदेश में सबके चहेते बन गये थे. सूरजमल ने सन 1733 में भरतपुर रियासत की स्थापना की थी.


सूरजमल के शौर्य गाथाएं


राजा सूरजमल का जयपुर रियासत के महाराजा जयसिंह से अच्छा रिश्ता था. जयसिंह की मृत्यु के बाद उसके बेटों ईश्वरी सिंह और माधोसिंह में रियासत के वारिश बनने को लेकर झगड़ा शुरु हो गया. सूरजमल बड़े पुत्र ईश्वरी सिंह को रियासत का अगला वारिस बनाना चाहते थे, जबकि उदयपुर रियासत के महाराणा जगतसिंह छोटे पुत्र माधोसिंह को राजा बनाने के पक्ष में थे. इस मतभेद की स्थिति में गद्दी को लेकर लड़ाई शुरु हो गई. मार्च 1747 में हुए संघर्ष में ईश्वरी सिंह की जीत हुई. लड़ाई यहां पूरी तरह खत्म नहीं हुई. माधोसिंह मराठों, राठोड़ों और उदयपुर के सिसोदिया राजाओं के साथ मिलकर वापस रणभूमि में आ गया. ऐसे माहौल में राजा सूरजमल अपने 10,000 सैनिकों को लेकर रणभूमि में ईश्वरी सिंह का साथ देने पहुंच गये.


सूरजमल को युद्ध में दोनों हाथो में तलवार ले कर लड़ते देख राजपूत रानियों ने उनका परिचय पूछा तब सूर्यमल्ल मिश्र ने जवाब दिया-

'नहीं जाटनी ने सही व्यर्थ प्रसव की पीर, जन्मा उसके गर्भ से सूरजमल सा वीर'.

इस युद्ध में ईश्वरी सिंह को विजय प्राप्त हुई और उन्हें जयपुर का राजपाठ मिल गया. इस घटना के बाद महाराजा सूरजमल का डंका पूरे भारत देश में बजने लगा.

महाराजा सूरजमल जाट का साम्राज्य विस्तार


1753 तक महाराजा सूरजमल ने दिल्ली और फिरोजशाह कोटला तक अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ा लिया था. इस बात से नाराज़ होकर दिल्ली के नवाब गाजीउद्दीन ने सूरजमल के खिलाफ़ मराठा सरदारों को भड़का दिया. मराठों ने भरतपुर पर चढ़ाई कर दी. उन्होंने कई महीनों तक कुम्हेर के किले को घेर कर रखा. मराठा इस आक्रमण में भरतपुर पर तो कब्ज़ा नहीं कर पाए, बल्कि इस हमले की कीमत उन्हें मराठा सरदार मल्हारराव के बेटे खांडेराव होल्कर की मौत के रूप में चुकानी पड़ी. कुछ समय बाद मराठों ने सूरजमल से सन्धि कर ली.


लोहागढ़ किला

सूरजमल ने अभेद लोहागढ़ किले का निर्माण करवाया था, जिसे अंग्रेज 13 बार आक्रमण करके भी भेद नहीं पाए. मिट्टी के बने इस किले की दीवारें इतनी मोटी बनाई गयी थी कि तोप के मोटे-मोटे गोले भी इन्हें कभी पार नहीं कर पाए. यह देश का एकमात्र किला है, जो हमेशा अभेद रहा.


तत्कालीन समय में सूरजमल के रुतबे की वजह से जाट शक्ति अपने चरम पर थी. सूरजमल से मुगलों और मराठों ने कई मौको पर सामरिक सहायता ली. आगे चलकर किसी बात पर मनमुटाव होने की वजह से सूरजमल के सम्बन्ध मराठा सरदार सदाशिव भाऊ से बिगड़ गए थे..


उदार प्रवृति के धनी


पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों का संघर्ष अहमदशाह अब्दाली से हुआ. इस युद्ध में हजारों मराठा योद्धा मारे गए. मराठों के पास रसद सामग्री भी खत्म चुकी थी. मराठों के सम्बन्ध अगर सूरजमल से खराब न हुए होते, तो इस युद्ध में उनकी यह हालत न होती. इसके बावजूद सूरजमल ने अपनी इंसानियत का परिचय देते हुए, घायल मराठा सैनिकों के लिए चिकित्सा और खाने-पीने का प्रबन्ध किया.


भरतपुर रियासत का विस्तार


उस समय भरतपुर रियासत का विस्तार सूरजमल की वजह से भरतपुर के अतिरिक्त धौलपुर, आगरा, मैनपुरी, अलीगढ़, हाथरस, इटावा, मेरठ, रोहतक, मेवात, रेवाड़ी, गुडगांव और मथुरा तक पहुंच गया था.


युद्ध के मैदान में ही मिली इस वीर को वीरगति

हर महान योद्धा की तरह महाराजा सूरजमल को भी वीरगति का सुख समरभूमि में प्राप्त हुआ. 25 दिसम्बर 1763 को नवाब नजीबुद्दौला के साथ हिंडन नदी के तट पर हुए युद्ध में सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए. उनकी वीरता, साहस और पराक्रम का वर्णन सूदन कवि ने 'सुजान चरित्र' नामक रचना में किया है.


हमारे इतिहास को गौरवमयी बनाने का श्रेय सूरजमल जैसे वीर योद्धाओं को ही जाता है. जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए. ऐसे सच्चे सपूतों को हमेशा वीर गाथाओं में याद किया जाएगा.


मुगलों के आक्रमण का प्रतिकार करने में उत्तर भारत में जिन राजाओं की प्रमुख भूमिका रही है, उनमें भरतपुर (राजस्थान) के महाराजा सूरजमल जाट का नाम बड़ी श्रद्धा एवं गौरव से लिया जाता है। उनका जन्म 13 फरवरी, 1707 में हुआ था। ये राजा बदनसिंह ‘महेन्द्र’ के दत्तक पुत्र थे। उन्हें पिता की ओर से वैर की जागीर मिली थी। वे शरीर से अत्यधिक सुडौल, कुशल प्रशासक, दूरदर्शी व कूटनीतिज्ञ थे। उन्होंने 1733 में खेमकरण सोगरिया की फतहगढ़ी पर हमला कर विजय प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने 1743 में उसी स्थान पर भरतपुर नगर की नींव रखी तथा 1753 में वहां आकर रहने लगे।


महाराजा सूरजमल की जयपुर के महाराजा जयसिंह से अच्छी मित्रता थी। जयसिंह की मृत्यु के बाद उसके बेटों ईश्वरी सिंह और माधोसिंह में गद्दी के लिए झगड़ा हुआ। सूरजमल बड़े पुत्र ईश्वरी सिंह के, जबकि उदयपुर के महाराणा जगतसिंह छोटे पुत्र माधोसिंह के पक्ष में थे। मार्च 1747 में हुए संघर्ष में ईश्वरी सिंह की जीत हुई। आगे चलकर मराठे, सिसौदिया, राठौड़ आदि सात प्रमुख राजा माधोसिंह के पक्ष में हो गये। ऐसे में महाराजा सूरजमल ने 1748 में 10,000 सैनिकों सहित ईश्वरी सिंह का साथ दिया और उसे फिर विजय मिली। इससे महाराजा सूरजमल का डंका सारे भारत में बजने लगा।

भरतपुर साम्राज्य के सिक्के


मई 1753 में महाराजा सूरजमल ने दिल्ली और फिरोजशाह कोटला पर अधिकार कर लिया। दिल्ली के नवाब गाजीउद्दीन ने फिर मराठों को भड़का दिया। अतः मराठों ने कई माह तक भरतपुर में उनके कुम्हेर किले को घेरे रखा। यद्यपि वे पूरी तरह उस पर कब्जा नहीं कर पाये और इस युद्ध में मल्हारराव का बेटा खांडेराव होल्कर मारा गया। आगे चलकर महारानी किशोरी ने सिंधियाओं की सहायता से मराठों और महाराजा सूरजमल में संधि करा दी।


उन दिनों महाराजा सूरजमल और जाट शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर थी। कई बार तो मुगलों ने भी सूरजमल की सहायता ली। मराठा सेनाओं के अनेक अभियानों में उन्होंने ने बढ़-चढ़कर भाग लिया; पर किसी कारण से सूरजमल और सदाशिव भाऊ में मतभेद हो गये। इससे नाराज होकर वे वापस भरतपुर चले गये। 14 जनवरी, 1761 में हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा शक्तियांे का संघर्ष अहमदशाह अब्दाली से हुआ। इसमें एक लाख में से आधे मराठा सैनिक मारे गये। मराठा सेना के पास न तो पूरा राशन था और न ही इस क्षेत्र की उन्हें विशेष जानकारी थी। यदि सदाशिव भाऊ के महाराजा सूरजमल से मतभेद न होते, तो इस युद्ध का परिणाम भारत और हिन्दुओं के लिए शुभ होता।


इसके बाद भी महाराजा सूरजमल ने अपनी मित्रता निभाई। उन्होंने शेष बचे घायल सैनिकों के अन्न, वस्त्र और चिकित्सा का प्रबंध किया। महारानी किशोरी ने जनता से अपील कर अन्न आदि एकत्र किया। ठीक होने पर वापस जाते हुए हर सैनिक को रास्ते के लिए भी कुछ धन, अनाज तथा वस्त्र दिये। अनेक सैनिक अपने परिवार साथ लाए थे। उनकी मृत्यु के बाद सूरजमल ने उनकी विधवाओं को अपने राज्य में ही बसा लिया। उन दिनों उनके क्षेत्र में भरतपुर के अतिरिक्त आगरा, धौलपुर, मैनपुरी, हाथरस, अलीगढ़, इटावा, मेरठ, रोहतक, मेवात, रेवाड़ी, गुड़गांव और मथुरा सम्मिलित थे।


मराठों की पराजय के बाद भी महाराजा सूरजमल ने गाजियाबाद, रोहतक और झज्जर को जीता। वीर की सेज समरभूमि ही है। 25 दिसम्बर, 1763 को नवाब नजीबुद्दौला के साथ हुए युद्ध में गाजियाबाद और दिल्ली के मध्य हिंडन नदी के तट पर महाराजा सूरजमल ने वीरगति पायी। उनके युद्धों एवं वीरता का वर्णन सूदन कवि ने ‘सुजान चरित्र’ नामक रचना में किया है।

Raj Kaushal Portal launched by Rajasthan Government

Raj Kaushal Portal and “Online Shramik Employment Exchange” has been launched by the Rajasthan Goverment. The portal has been developed by the department of Information and Technology (IT) and Rajasthan Skill & Livelihoods Development Corporation (RSLDC). The “Raj Kaushal Portal” aims to improve availability of opportunities for the migrated workers and hence acts as a bridge between industry and labourers.
The portal aims to overcome the labour shortage faced by the industries by making it easier for the workers to get employment who are suffering from livelihood losses. The “Online Shramik Employment Exchange” comprises of data of over 12 lakh migrant workers including registered workers of planning offices and building and other construction boards. It also contains data of more than 53 lakh workers and manpower trained in RSLDC and ITI.

चित्तौड़गढ़ के किले का इतिहास

चित्तौड़गढ़ के किले का इतिहास

चित्तौड़गढ़ दुर्ग

चित्तौड़गढ़ किले का निर्माण मौर्य वंश के राजा चित्रांगद मौर्य ने सातवीं शताब्दी में करवाया था । चित्तौड़गढ़ किला राज्य का सबसे प्राचीनतम दुर्ग है । इसका निर्माण चित्रकूट नामक पहाडी पर किया गया है ।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग अपने सात विशालकाय मुख्य द्वारों के लिए भी प्रसिद्ध है, जो ऊपर चढ़ते समय एक के बाद एक आते हैं, प्रथम द्वार का नाम पाण्डुपोल, दूसरा द्वार भैरवपोल, तीसरा द्वार गणेशपोल, चौथा द्वार लक्ष्मणपोल, पाँचवाँ द्वार जोड़नपोल, छठा द्वार त्रिपोलिया तथा सातवां और आखिरी द्वार रामपोल है ।

महाराणा प्रताप की जीवनी व इतिहास

चित्तौड़गढ़ किले के बारे में प्रचलित कहावत है कि " गढ़ तो चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढैया ।"

मुख्य इमारतें जो चित्तौड़गढ़ किले में स्थित है ।

विजय स्तम्भ :- 

विजय स्तम्भ

महाराणा कुम्भा ने महमूद खिलजी के नेतृत्व वाली मालवा और गुजरात की सेनाओं पर विजय के स्मारक के रूप में सन् 1440-1448 के मध्य इसका निर्माण करवाया था, इसीलिए इसका नाम विजय स्तम्भ रखा गया, इसका वास्तुकार जैता था, इसमें पत्थर पर उकेरी गई हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों के कारण इसे हिन्दू देवी देवताओं का अजायबघर भी कहा जाता है । 9 मंजिला विजय स्तम्भ की ऊंचाई 120 फिट है । अंदर की ओर बनी हुई गोलाकार सीढ़ियों से आप ऊपर तक जा सकते हैं ।
कीर्ति स्तम्भ :- 

कीर्ति स्तम्भ का निर्माण भगेरवाल जैन व्यापारी जीजा ने बारहवीं शताब्दी में करवाया था । यह स्मारक जैन सम्प्रदाय के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है । एक बार बिजली गिरने के कारण कीर्ति स्तम्भ क्षतिग्रस्त हो गया था और स्तंभ के शीर्ष की छत्री खंडित हो गई थी जिसे चित्तौड़गढ़ के तत्कालीन महाराणा फ़तेहसिंह जी ने दुरुस्त करवाया था ।
रानी पद्मिनी का महल :- 

किले में स्थित रानी पद्मिनी महल रानी पद्मिनी के साहस और शान की कहानी सुनाता है । महल के पास ही सुंदर कमल का एक तालाब है । यही वह स्थान है जहाँ सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मिनी के प्रतिबिम्ब की एक झलक देखी थी । रानी के शाश्वत सौंदर्य से सुलतान अभिभूत हो गया और उसकी रानी को पाने की इच्छा के कारण अंततः युद्ध हुआ ।

पृथ्वीराज चौहान की जीवनी व इतिहास

चित्तौड़गढ़ किले पर अधिकार :- 

सातवीं शताब्दी में निर्माण के पश्चात सन् 738 में गुहिल वंश के वास्तविक संस्थापक बप्पा रावल ने मौर्यवंश के अंतिम शासक मानमोरी को हराकर यह किला अपने अधिकार में कर लिया, तत्पश्चात मालवा के परमार राजा मुंज ने इसे गुहिलवंशियों से छीनकर अपने राज्य में मिला लिया और 9 वीं से 10 वीं शताब्दी तक परमारों का आधिपत्य रहा ।
सन् 1133 में गुजरात के सोलंकी राजा जयसिंह ने परमार राजा यशोवर्मन को हराकर मालवा के साथ चित्तौड़गढ़ का दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया । सोलंकी राजा अजयपाल को परास्त राजा सामंत सिंह ने सन 1174 में पुनः चित्तौड़गढ़ किले पर गुहिलवंशियों का आधिपत्य स्थापित कर दिया ।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में तीन साके 1303, 1534, 1567-68 में हुए हैं ।

प्रथम साका :- 

सन् 1303 में महाराणा रत्नसिंह की अलाउद्दीन खिलजी से लड़ाई हुई । युद्ध में अलाउद्दीन खिलजी की विजय हुई, इसी समय चित्तौड़गढ़ किले का प्रथम शाका हुआ । अलाउद्दीन ने चित्तौड़गढ़ का किला अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंप दिया जिसने वापसी पर चित्तौड़ का राजकाज कान्हादेव के भाई मालदेव को सौंपा ।
सिसोदिया राजवंश के संस्थापक राणा हम्मीर ने मालदेव से यह किला छीन लिया । हमीर ने अपनी सूझबूझ और योग्यता से शासन करते हुए राज्य का विस्तार किया और चित्तौड़ का गौरव पुनः स्थापित किया ।

द्वितीय साका :- 

यह 1534 ईस्वी में राणा विक्रमादित्य के शासनकाल में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के समय हुआ था। इसमें रानी कर्मवती के नेतृत्व में स्त्रियों ने जौहर किया ।

तृतीय साका :- 

यह 1567 में राणा उदयसिंह के शासनकाल में अकबर के आक्रमण के समय हुआ, जिसमें जयमल और पत्ता के नेतृत्व में चित्तौड़गढ़ की सेना ने मुगल सेना का जमकर मुकाबला किया और स्त्रियों ने जौहर किया था ।

CHITTORGARH


चित्तौड़गढ़ दुर्ग के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें

1. चित्तौड़गढ़ दुर्ग में विजय स्तम्भ, कुम्भा स्वामी मंदिर, कुम्भा के महल, श्रृंगार चंवरी मंदिर, चार दिवारी और सातों द्वारों का निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया था ।
2. चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित जयमल की हवेली का निर्माण महाराजा उदयसिंह ने करवाया था ।
3. भैरव पोल के पास ही वीर कल्ला राठौड़ की छतरी स्थित है ।
4. इस दुर्ग को सभी किलों का सिरमौर कहा जाता है ।
5. चित्तौड़गढ़ दुर्ग गंभीरी और बेड़च नदियों के संगम पर स्थित है ।
6. चित्तौड़गढ़ दुर्ग की समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 1850 फीट है ।
7. चित्तौड़गढ़ की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त होने वाले जयमल और पत्ता की बहादुरी से खुश होकर अकबर ने आगरा के किले के प्रवेश द्वार पर इनकी हाथी पर सवार संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित करवाई ।
8. इस दुर्ग में प्रमुख जल स्त्रोत भीमलत कुंड, रामकुंड व चित्रांगद मोरी तालाब है ।
9. इस दुर्ग में खेती भी की जाती है ।
10. यह राज्य का सबसे बडा दुर्ग है ।
11. माना जाता है कि भीम ने महाभारत काल में अपने घुटने के बल से यहाँ पानी निकाला था ।

पांडुपोल

चित्तौड़गढ़ ! वीरों को पैदा करने वाली वह भूमि है जिसने समूचे भारत के सम्मुख शौर्य, देशभक्ति एवम् बलिदान का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया । यहाँ के असंख्य वीरों ने अपने देश तथा धर्म की रक्षा के लिए प्राणों का बलिदान दिया । यहाँ का कण-कण हमारे शरीर में देशप्रेम की ऊर्जा पैदा करता है । इस वीर प्रसूता भूमि को बार बार नमन । 🙏🙏