किसान की होशियार बेटी राजस्थानी लोककथा

किसान की होशियार बेटी राजस्थानी लोककथा

Rajasthani lokkatha


एक समय की बात है रामपुर गांव में बलदेव नाम का एक किसान रहता था। उसकी एक बेटी मीना थी जो बहुत सुन्दर और होशियार थी। बलदेव के खेत जमींदार के पास गिरवी थे।


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बलदेव खेतों में मेहनत करके घर का गुजारा चलाता था। उसने 3-4 महीने खेत में काम करके एक फ़सल उगाई थी। जो फ़सल अब पक कर तैयार हो चुकी थी। बलदेव ने अपनी सारी फ़सल को बेचकर पैसे कमा लिए। बलदेव फ़सल बेचकर जो भी पैसे मिलते थे उसके तीन हिस्से लगाता था।

एक हिस्सा वह घर के ख़र्च के लिए रखता था। दूसरा हिस्सा जमींदार को ब्याज़ के रूप में देता था और तीसरा हिस्सा अपनी बेटी मीना की शादी के लिए अलग से रख देता था। फ़सल बिकने पर जमींदार अपना ब्याज़ लेने बलदेव के घर पहुंच गया।

वहाँ पर उसने मीना को देखा जो की बहुत सुन्दर थी। उसके बाद वह बलदेव से अपना ब्याज़ लेकर चला गया। कुछ दिनों में बलदेव अपनी अगली फ़सल उगाने में लग गया। 3-4 महीने की मेहनत के बाद फ़सल उग गयी और कुछ दिनों के बाद उसकी कटाई होने वाली थी।

लेकिन तभी बारिश शुरू हो गयी और कुछ दिनों तक लगातार बारिश होती रही जिससे सारी फ़सल ख़राब हो गयी। इससे बलदेव और उसकी बेटी मीना बहुत दुखी हो गए। कुछ दिनों के बाद जमींदार अपना ब्याज़ लेने के लिए बलदेव के घर पर पहुंच गया।

बलदेव ने उसको बताया की अबकी बार बारिश की वजह से उसकी सारी फ़सल ख़राब हो गयी। जमींदार ने मीना की तरफ़ देखा और बलदेव से बोला यदि तुम अपनी बेटी की शादी मुझसे करा देते हो तो मै तुम्हारा सारा कर्ज माफ़ कर दूंगा। इस पर बलदेव ने आपत्ति जताई तो जमींदार ने एक तरकीब बताई की हम एक खेल खेलते है।

इसमें में एक काला और सफ़ेद पत्थर मै एक मटके के अंदर डाल दूंगा। मीना को उसमे से बिना देखे एक पत्थर को निकलना है। यदि वह काला पत्थर निकालेगी तो मीना को मुझसे शादी करनी होगी और मै तुम्हारा सारा कर्ज माफ़ कर दूंगा।

यदि वह सफ़ेद पत्थर निकालेगी तो उसको मुझसे शादी नहीं करनी पड़ेगी और मै तुम्हारा सारा कर्ज माफ़ कर दूंगा।

बलदेव को जमींदार का ब्याज़ भी देना था यदि वह उसकी बात नहीं मानता तो उसने खेल के लिए हा कर दी। जमींदार बहुत धोखेबाज़ था उसने जमीन से दोनों काले पत्थर लिए  और मटके के अंदर डाल दिए। मीना ने उसको दोनों काले पत्थर मटके के अंदर डालते हुए देख लिया।

मीना बहुत होशियार थी उसने कुछ देर सोचा फिर मटके के अंदर से एक पत्थर निकाला और गिरने का बहाना बना कर जमीन में गिर गयी और उस पत्थर को बाकी सभी पत्थर में मिला दिया। जमींदार और बलदेव सोचने लगे जो पत्थर मीना ने उठाया था वह कैसे पता चलेगा तो मीना बोली इसका पता हम मटके के अंदर के पत्थर से लगा सकते है।

मटके के अंदर पत्थर देखा तो उसका रंग काला था इसका मतलब मीना ने जो पत्थर उठाया और जो हाथ से गिर गया था उसका रंग सफ़ेद था। इस तरह मीना की होशियारी से बलदेव का कर्ज भी माफ़ हो गया और मीना को जमींदार से शादी भी नहीं करनी पड़ी ।

मीना ने समझदारी से काम लिया और जमीदार के चंगुल से खुद को बचा लिया ।


ढोला मारू की राजस्थानी प्रेमकथा

ढोला-मारू की राजस्थानी लोक-कथा

ढोला-मारू की राजस्थानी लोक-कथा

ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है इस गाथा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आठवीं सदी की इस घटना का नायक ढोला राजस्थान में आज भी एक-प्रेमी नायक के रूप में स्मरण किया जाता है ।

लोककथाओं के अनुसार ढोला नरवर के राजा नल का पुत्र था जिसे इतिहास में ढोला के नाम से जाना जाता है, ढोला का विवाह बालपने में जांगलू देश ( वर्तमान बीकानेर ) के पूंगल नामक ठिकाने के स्वामी पंवार राजा पिंगल की पुत्री मारवणी के साथ हुआ था । उस वक्त ढोला तीन वर्ष का जबकि मारवणी मात्र डेढ़ वर्ष की थी । इसीलिए शादी के बाद मारवणी को ढोला के साथ नरवर नहीं भेजा गया । बड़े होने पर ढोला की एक और शादी हो गयी । बचपन में हुई शादी के बारे को ढोला भी लगभग भूल चूका था । उधर जब मारवणी जवान हुई तो मां बाप ने उसे ले जाने के लिए ढोला को नरवर कई सन्देश भेजे । ढोला की दूसरी रानी को ढोला की पहली शादी का पता चल गया था उसे यह भी पता चल गया था कि मारवणी जैसी बेहद खुबसुरत राजकुमारी कोई और नहीं सो उसने ईर्ष्या के चलते राजा पिंगल द्वारा भेजा कोई भी सन्देश ढोला तक पहुँचने ही नहीं दिया वह सन्देश वाहकों को ढोला तक पहुँचने से पहले ही मरवा डालती थी ।

उधर मारवणी के अंकुरित यौवन ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया । एक दिन उसे स्वप्न में अपने प्रियतम ढोला के दर्शन हुए उसके बाद तो वह ढोला के वियोग में जलती रही उसे न खाने में रुचि रही न किसी और कार्य में । उसकी हालत देख उसकी मां ने राजा पिंगल से ढोला को फिर से सन्देश भेजने का आग्रह किया, इस बार राजा पिंगल ने सोचा सन्देश वाहक को तो राणी मरवा डालती है इसीलिए इस बार क्यों न किसी चतुर भांड को नरवर भेजा जाये, जो गाने के बहाने ढोला तक सन्देश पहुंचा उसे मारवणी के साथ हुई उसकी शादी की याद दिला दे ।

जब भांड नरवर के लिए रवाना हो रहा था तब मारवणी ने उसे अपने पास बुलाकर मारू राग में दोहे बनाकर दिए और समझाया कि कैसे ढोला के सम्मुख जाकर गाकर सुनाना है । भांड ने मारवणी को वचन दिया कि वह जीता रहा तो ढोला को जरूर लेकर आएगा और मर गया तो वहीं का होकर रह जायेगा ।

चतुर भांड याचक बनकर किसी तरह नरवर में ढोला के महल तक पहुँचने में कामयाब हो गया और रात होते ही उसने ऊँची आवाज में गाना शुरू किया । उस रात बादल छा रहे थे, अँधेरी रात में बिजलियाँ चमक रही थी । झीणी - झीणी पड़ती वर्षा की फुहारों के शांत वातावरण में भांड ने मल्हार राग में गाना शुरू किया ऐसे सुहाने मौसम में भांड की मल्हार राग का मधुर संगीत ढोला के कानों में गूंजने लगा और ढोला फन उठाये नाग की भांति राग पर झुमने लगा तब भांड ने साफ़ शब्दों में गाया -

"ढोला नरवर सेरियाँ, मारूवणी पूंगल गढ़माही ।"

गीत में पूंगल व मारवणी का नाम सुनते ही ढोला चौंका और उसे बालपने में हुई शादी की याद ताजा हो आई । भांड ने तो मल्हार व मारू राग में मारवणी के रूप का वर्णन ऐसे किया जैसे पुस्तक खोलकर सामने कर दी हो । उसे सुनकर ढोला तड़फ उठा ।

भांड पूरी रात गाता रहा । सुबह ढोला ने उसे बुलाकर पूछा तो उसने पूंगल से लाया मारवणी का पूरा संदेशा सुनाते हुए बताया कि कैसे मारवणी उसके वियोग में जल रही है ।

आखिर ढोला ने मारवणी को लाने हेतु पूंगल जाने का निश्चय किया पर उसकी दूसरी रानी ने उसे रोक दिया । ढोला ने कई बहाने बनाये पर राणी उसे किसी तरह रोक देती । पर एक दिन ढोला एक बहुत तेज चलने वाले ऊंट पर सवार होकर मारवणी को लेने चल ही दिया और पूंगल पहुँच गया ।

मारूवणी ढोला से मिलकर ख़ुशी से झूम उठी । दोनों ने पूंगल में कई दिन बिताये और एक दिन ढोला ने मारवणी को अपने साथ ऊंट पर बिठा नरवर जाने के लिए राजा पिंगल से विदा ली । कहते है रास्ते में रेगिस्तान में मारूवणी को सांप ने काट खाया पर शिव पार्वती ने आकर मारूवणी को जीवन दान दे दिया । आगे बढ़ने पर ढोला उमर-सुमरा के षड्यंत्र में फंस गया, उमर-सुमरा ढोला को घात से मार कर मारूवणी को हासिल करना चाहता था सो वह उसके रास्ते में जाजम बिछा महफ़िल जमाकर बैठ गया । ढोला जब उधर से गुजरा तो उमर ने उससे मनुहार की और ढोला को रोक लिया । ढोला ने मारूवणी को ऊंट पर बैठे रहने दिया और खुद उमर के साथ अमल की मनुहार लेने बैठ गया । भांड गा रहा था और ढोला उमर अफीम की मनुहार ले रहे थे उमर सुमरा के षड्यंत्र का ज्ञान भांड की पत्नी को था वह भी पूंगल की बेटी थी सो उसने चुपके से इस षड्यंत्र के बारे में मारूवणी को बता दिया ।

मारूवणी ने ऊंट के एड मारी, ऊंट भागने लगा तो उसे रोकने के लिए ढोला दौड़ा, पास आते ही मारूवणी ने कहा - धोखा है जल्दी ऊंट पर चढो और ढोला उछलकर ऊंट पर चढ़ा गया । उमर-सुमरा ने घोड़े पर बैठ पीछा किया पर ढोला का वह काला ऊंट उसके कहाँ हाथ लगने वाला था । ढोला मारूवणी को लेकर नरवर पहुँच गया और उमर-सुमरा हाथ मलता रह गया ।

नरवर पहुंचकर ढोला मारुवणी के साथ आनंद से रहने लगा ।

किसान की होशियार बेटी राजस्थानी लोककथा

लोकदेवता सत्यवादी वीर तेजाजी की जीवनी व इतिहास

श्री सत्यवादी वीर तेजाजी कथा व गौरवशाली इतिहास

VEER TEJAJI

जाट वीर धौलिया वंश, गांव खरनाल के मांय ।

आज दिन सुभस भंसे, बस्ती फूलां छाय ।।

शुभ दिन चौदस वार गुरु, शुक्ल माघ पहचान ।

सहस्र एक सौ तीस में, प्रकटे अवतारी ज्ञान ।।


सत्यवादी श्री वीर तेजाजी जाट का जन्म माघ शुक्ल चौदस, संवत 1130 (29 जनवरी 1074) के दिन सूर्योदय के शुभ मुहूर्त में, नागौर जिले के खरनाल गांव के धौलिया गौत्रीय जाट घराने में हुआ ।

तेजाजी के पिता का नाम ताहड़देव ( थिरराज ) और माता का नाम रामकुंवरी था ।

तेजाजी की वंशावली कुछ इस प्रकार है

1. महारावल 2. भौमसेन 3. पीलपंजर 4. सारंगदेव 5. शक्तिपाल 6. रायपाल 7. धवलपाल 8. नयनपाल 9. घर्षणपाल 10. तक्कपाल 11. मूलसेन 12. रतनसेन 13. शुण्डल 14. कुण्डल 15. पिप्पल 16. उदयराज 17. नरपाल 18. कामराज 19. बोहितराव ( बक्सा जी ) 20. ताहड़देव ( थिरराज ) 21. तेजाजी ( तेजपाल )


जिस समय तेजाजी का जन्म हुआ, दादा बक्सा जी खरनाल गाँव के मुखिया थे । खरनाल परगने के अधिकारक्षेत्र में 24 गांव आते थे ।

तेजाजी का ननिहाल अजमेर जिले की किशनगढ़ तहसील के त्यौद गांव में ज्याणी गोत्र में था । तेजाजी के नाना का नाम दुल्हण जी और मामा का नाम हेमुजी था ।

ताहड़देव का विवाह त्यौद के मुखिया दुल्हण जी की पुत्री रामकुंवरी के साथ हुआ परंतु जब शादी के बारह वर्षों पश्चात भी संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ, तो बक्सा जी ने ताहड़देव का दूसरा विवाह अठ्यासन के मुखिया करणा जी फड़ौदा की पुत्री रामीदेवी के साथ करवा दिया ।

इधर पुत्र प्राप्ति के लिए रामकुंवरी भी अपने पति ताहड़देव से अनुमति लेकर अपने पीहर त्यौद के जंगलों में गुरु मंगलनाथ के मार्गदर्शन में नागदेवता की आराधना करने लगी ।

12 वर्षों की कड़ी तपस्या के फलस्वरूप रामकुंवरी को नागदेवता से पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद मिला, तत्पश्चात रामकुंवरी पुनः खरनाल लौट आई ।

इस बीच रामीदेवी से ताहड़देव को पांच पुत्र प्राप्त हुए ( रूपजीत, रणजीत, गुणजीत, महेशजी, नागजीत ) ।

समय बीतने पर रामकुंवरी के गर्भ से पुत्र तेजाजी व पुत्री राजल पैदा हुए ।

VEER TEJAJI

रामकुंवरी ने पति ताहड़देव से तेजाजी के जन्म की खुशी में पुष्कर पूर्णिमा के दिन पुष्कर स्नान और वापसी में त्यौद के जंगलों में नागदेवता की पूजा की इच्छा जताई । ताहड़देव ने सहर्ष स्वीकृति दी और तेजाजी के जन्म के 9 वें महीने पुष्कर स्नान के लिए रवाना हुए । ताहड़देव के साथ उनके भाई आसकरण भी पुष्कर गए ।

पुष्कर में पनेर के मुखिया रायमल जी भी सपरिवार अपनी पुत्री पेमल के जन्म की खुशी में पुष्कर स्नान के लिए आये हुए थे । वहीं पर आसकरण और रायमल में मित्रता हो गई और बातों ही बातों में उन्होंने इस मित्रता को एक रिश्ते में बदलने की ठानी । तेजाजी और पेमल का विवाह करके ।

रायमल जी ने ताहड़देव से तेजा और पेमल के रिश्ते की बात की । ताहड़देव भी इस रिश्ते के लिए सहर्ष तैयार हो गए । विवाह का मुहूर्त दो दिन पश्चात विक्रम संवत 1131 की पुष्कर पूर्णिमा को गोधुली वेला में निश्चित किया गया । उस समय तेजाजी की उम्र मात्र 9 महीने और पेमल की उम्र 6 महीने थी ।


रीति रिवाजों के अनुसार विवाह की सहमति के लिए तेजा और पेमल के मामाओं को आमंत्रित किया गया । तेजा के मामा हेमूजी सही समय पर पुष्कर पहुँच गए, परन्तु पेमल के मामा खाजू काला को जायल से पुष्कर पहुँचने में देर हो गई । खाजू काला जब पुष्कर  पहुंचा । तेजा और पेमल के फेरे हो चुके थे, और जब खाजू काला को पता चला कि उसकी भांजी का विवाह ताहड़देव के पुत्र तेजा के साथ सम्पन्न हुआ है, वह आग बबूला हो उठा । जायल के काला जाटों और धौलिया जाटों के मध्य पीढ़ियों पुरानी दुश्मनी थी । क्रोधित खाजू काला ने अपशब्दों का प्रयोग किया और तलवार निकाल ली । झगड़े में खाजू काला मारा गया ।

पहले से चली आ रही दुश्मनी में एक गाँठ और पड़ गई । तेजा जी की सासु बोदलदे अपने भाई की मौत से काफी नाराज हुई और मन ही मन अपने भाई की मौत का बदला लेने और बेटी पेमल को अपने भाई के हत्यारों के घर न भेजने का प्रण लिया ।

समय बीतता गया और बक्सा जी ने वृद्धावस्था को देखते हुए खरनाल का मुखिया पद पुत्र ताहड़देव को दे दिया । प्रतिदिन की तरह एक बार जब तेजाजी बड़कों की छतरी में स्थापित शिवलिंग पर जल चढ़ाकर आ रहे थे, रास्ते में ठाकुरजी के मंदिर के बाहर भीड़ लगी देखी । नजदीक जाने पर पता चला कि पाँचू मेघवाल नाम के बच्चे ने भूख से त्रस्त होकर ठाकुरजी के मंदिर में प्रवेश कर प्रसाद में से एक लड्डू उठा लिया था । इस बात से नाराज पुजारी उसकी पिटाई कर रहा था । तेजाजी ने पुजारी के लात-घूसों से पांचू को बचाया और सीने से लगाकर सान्त्वना प्रदान की । पंडित जी ने गुस्से से बताया कि यह नीची जाति का लड़का है और इसने ठाकुरजी के मंदिर में प्रवेश करने और प्रसाद चोरी करने का अपराध किया है । तेजाजी ने पुजारी को समझाया कि छोटी जाति की सबरी भीलनी के जूठे बेर भी तो आपके ठाकुर जी ने स्वयं खाये थे और भगवान श्रीकृष्ण भी तो गुर्जरियों से माखन चुरा कर खाया करते थे । तेजाजी ने बताया कि ठाकुर जी का निवास अकेली प्रतिमा में ही नहीं है बल्कि प्रत्येक प्राणी में है । बालक तो वैसे ही परमात्मा का स्वरूप होता है । उस दिन के पश्चात पाँचू मेघवाल तेजाजी के सानिध्य में रहा ।


ताहड़देव का मित्र लक्खी बंजारा (लाखा बालद) एक बार जब माल लादकर खरनाल के रास्ते सिंध की ओर रहा था, ताहड़देव के आग्रह पर खरनाल में डेरा लगाया और ताहड़देव कि मेजबानी का आनंद लेने लगा । उसी दिन लाखा के डेरे में एक गर्भवती घोड़ी ने एक सफेद रंग की बछिया को जन्म दिया । बछिया के जन्म लेते ही उसकी मां मर गई ।

लाखा ने नवजात बछिया को उपहार स्वरूप बालक तेजा को दे दी । तेजाजी ने उस बछिया की सेवा-सुश्रुषा की उसे गाय का दूध पिलाकर बड़ा किया । तेजाजी ने उसका नाम " लीलण " रखा । लीलण तेजाजी की प्रिय सखी बन गई ।


समय अपनी गति से आगें बढ़ता रहा । तेजाजी ने अपने भाईयों के साथ पिता ताहड़देव और दादा बक्सा जी से मल्लयुद्ध और भाला चलाना सीखा । काका आसकरण ने तेजा को तलवार चलाना सिखाया । इसी बीच लुटेरों ने खेतों को देखने गए ताहड़देव और आसकरण पर धोखे से हमला किया और उनकी हत्या कर दी ।

पंचों ने पुनः बक्सा जी को खरनाल के मुखिया पद पर बिठाया ।

9 वर्ष की उम्र में तेजाजी कुछ वर्षों के लिए अपने ननिहाल त्यौद चले गए और वहीँ पर गुरु मंगलनाथ से शिक्षा लेने लगे । त्यौद में मामा हेमुजी से धनुर्विद्या और तलवारबाजी सिखना जारी रखा ।

16 वर्ष के होने पर तेजाजी खरनाल वापस लौटे । उस समय खरनाल चोरों और लुटेरों के चौतरफा हमले झेल रहा था । तेजाजी ने आते ही खरनाल को चोर गिरोह के आतंक से मुक्ति दिलाई ।


" गाज्यौ - गाज्यौ जेठ-आषाढ़ कँवर तेजा रे ।

लगतो ही गाज्यौ रे सावण-भादवो ।।

सूतो काईं सुख भर नींद कँवर तेजा रे ।

थारोड़ा साथिड़ा बीजै बाजरो ।"


संवत 1160 का वर्ष था । इस बार इंद्र देव कुछ ज्यादा ही मेहरबान हुए और जेठ - आषाढ़ माह में ही भरपूर बारिश होने लगी । पुराने समय में गांव के मुखिया द्वारा हलोतिया की रस्म करने के पश्चात ही किसान अपने खेतों को जोतने जाते थे । दादा बक्साजी किसी काम से गाँव से बाहर गये हुए थे । तब माता रामकुंवरी ने सुबह के समय जगाया और हलोतिया करने भेजा । तेजाजी ने बैलों को संवारा और बीज उठाकर खेत को चले गए । पहले बीजों को उछाल कर खेत जोता जाता था ।

तेजाजी ने पहली बार बीज को जमीन में हल द्वारा ऊर कर बोना सिखाया । एक कतार में बोना सिखाया । कीट-पतंगों से बचने के लिए अलग-अलग तरकीबें सुझाई । इसलिए तेजा जाट को कृषि वैज्ञानिक कहा जाता है और पूरी किसान कौम उनको एक महान कृषि वैज्ञानिक व महापुरुष मानती है ।


TEJAJI MANDIR SURSURA

भूखे पेट खेतों में आये तेजाजी ने दोपहर तक 12 कोस की आवड़ी बो दी । उनके लिए खाना व बैलों के लिए चारा उनकी भाभी बड़े देर से लाई थी । तेजाजी ने नाराजगी जाहिर की तो भाभी ने ताना दिया कि " आपकी परणाई अपने घर बैठी है उसे ले आओ वो जल्दी खाना ले आएगी ।"

यह ताना तेजाजी के घाव कर गया । तेजाजी ने बैलों को चरने के लिए खुले छोड़ दिये और लीलण पर सवार होकर घर आ गए । माता रामकुंवरी से अपने विवाह के बारे में जानकारी पूँछी तो पता चला कि, पेमल के मामा की मौत के कारण यह बात दोनों परिवारों ने किसी को बताई नहीं थी और इसी घटना का बदला लेने के लिए पेमल की मां ने अपने भाई बालिया नाग और धर्मभाई कालिया मीणा लुटेरों से सहयोग मांगा था । कालिया-बालिया ने मिलकर षड्यंत्र कर ताहड़देव और आसकरण की हत्या कर दी थी । बोदल दे, पेमल की शादी अन्यत्र करने की सोच रही है ।

तेजाजी को शादी की जानकारी प्राप्त हो चुकी थी । अब तेजाजी पेमल को लाने की तैयारी करने लगे । माता रामकुंवारी ने पनेर जाने से पहले बहन राजल को घर लाने का आदेश दिया ताकि भाभी पेमल का स्वागत करने के लिए तैयार रहे । तेजाजी ने माता का आदेश मानते हुए, बहन राजल जो कि अजमेर के पास तबीजी गांव में जोगाजी सियाग के घर ब्याही हुई थी । लेने पहुँचे और अगले दिन राजल को लेकर घर आये । जाटों में सदैव यह परंपरा रही है कि बहू पहली बार घर आये तो ननद उसका स्वागत करें ।


माता रामकुंवरी ने पंडितजी से तेजाजी के प्रस्थान के लिए शुभ मुहूर्त जानना चाहा । पंडितजी ने अपने पोथी-पन्नों में देखा और निराशा से कहा कि अभी पनेर जाने का मुहूर्त नहीं है ।

तेजाजी ने कहा कि मैं तीज से पहले पनेरा जाऊँगा । मैं मुर्हूत नहीं मानता " शेर जब जंगल में निकलता है तो वह किसी से मुर्हूत पूँछकर नहीं निकलता ।"

तेजाजी ने लीलण घोड़ी का श्रृंगार किया और सवार होकर पनेर के लिए अकेले ही निकल पड़े । रास्ते में बरसात होने लगी । तेजाजी नदी नाले लांघते हुए रात्रि में खरनाल पहुँचे । रात्रि विश्राम के लिए बाग के माली को दो सोने की मोहर दी ।

लीलण ने रात में पूरे बाग को उजाड़ दिया ।

सुबह के समय बाग के माली ने जाकर पेमल को शिकायत की " बाग में रात्रि के समय एक परदेशी आया था जिसकी घोड़ी ने पूरे बाग को उजाड़ दिया है ।"

पेमल ने परदेशी के बारे में जानकारी लेने के लिए भाभी को बाग में भेजा ।

तेजाजी ने जब अपना परिचय दिया तो पेमल की भाभी उन्हें पहचान गई और घर पधारने का निमंत्रण दिया ।

इधर जब सास बोदलदे को तेजाजी के पनेर आने की सूचना मिली तो काफी क्रोधित हुई ।

पेमल को जब भाभी से पता चला कि बाग में आया परदेशी उसका पति परमेश्वर है तो उससे रहा नहीं गया और वह अपनी सहेली लाछां गूर्जरी के साथ पानी लेने का बहाना बनाकर बाग की ओर गई ।

शाम के समय जब तेजाजी बाग से निकलकर, रायमल जी के घर की ओर बढ़े, तब पनघट पर पेमल और लाछां के साथ पहला साक्षात्कार हुआ ।

जब लीलण पर सवार तेजाजी ने रायमल जी की पोळ में प्रवेश किया, लीलण के घुँघरुओं की आवाज से गायें बिदक गई । पहले से क्रुद्ध सास बोदलदे ने ताना मारा " काला नाग खाये उसको, कौन है जिसने मेरी गायें बिदका दी ?"

सासु बोदलदे के इन बोलों से तेजाजी दुखी हुए और लीलण की पीठ थपथपाई और बोले " जिन कदमों आई हो लीलण उन्हीं कदमों वापस लौट चलो । नुगरां की धरती पर वासो न करां ।"


लीलण वापस मुड़ कर रायमल जी की पोळ से बाहर निकल गई ।

यह सब घटनाक्रम छत पर खड़ी पेमल और लाछां ने देखा तो दौड़कर नीचें आई ।

लाछां दौड़कर तेजाजी के पीछे गई और उन्हें रोका । तेजाजी ने वापस रायमल जी की पोळ लौटने से मना कर दिया । तब लाछां गूर्जरी ने तेजाजी को अपने घर लाछां की रंगबाड़ी में रोका ।

पेमल ने अपनी माँ को काफी बुरा भला कहा और पिता रायमल जी को जब इसका पता चला तो वो लाछां की रंगबाड़ी तेजाजी को मनाने पहुंचे । तेजाजी ने वहीँ रुकने का फैसला किया ।

तेजाजी के लाछां की रंगबाड़ी में रुकने से बोदलदे की योजना असफल रही और बोदलदे लाछां से क्रोधित हो गई ।

बोदलदे ने तत्काल अपने धर्मभाई कालिया मीणा से सम्पर्क किया और लाछां की सभी गायों को चोरने को कहा । कालिया मीणा इसके लिए खुशी खुशी तैयार हो गया ।


बोदलदे ने कालिया मीणा को आश्वस्त किया कि उसे रोकने के लिए पनेर से कोई नहीं आयेगा ।


आज तो मौसम भी चोरों के लिए मुनासिब था, बरसात हो रही थी और रह रहकर बिजलियाँ चमक रही थी । कालिया मीणा ने रात्रि में लाछां की गायें चुरा ली, परन्तु आज तेजाजी 'लाछां की रंगबाड़ी' में सो रहे थे इसलिए, लाछां और उसका पति नंदू भी गायों के बाड़े में बनी झोपड़ी में सो रहे थे । गायों के घेरने की खड़बड़ाहट से वे जाग गए, नंदू ने जब प्रतिरोध की तो चोरों ने उसे भी पीटा और भाग गए । लाछां ने चोरी की सूचना मुखिया रायमलजी तक पहुंचाने की कोशिश की परंतु बोदलदे जो इसके लिए तैयार थी उसने बाहर से ही लाछां को भगा दिया ।


लाछां जानती थी कि जितना समय बीतता जायेगा, उसकी गायों का वापस मिलना भी उतना ही मुश्किल होता जायेगा । रोती-बिलखती लाछां ढोली के घर पहुँची और उससे "बार" का डाका ( पुराने जमाने में युद्ध की तैयारी के लिए ढोल को खास लय में बजाया जाता था, ताकि गांव वाले सतर्क हो जाये ) बजाने का अनुरोध किया, परंतु ढोली ने भी उसे मना कर दिया क्योंकि बोदलदे ने उसे पहले ही धमका रखा था ।


निराश और रोती हुई लाछां अपने पति के पास पहुँची और उसे लेकर अपने घर ' लाछां की रंगबाड़ी ' पहुंची, जहां तेजाजी सो रहे थे । लाछां नंदू के साथ घर के बाहर बैठ कर रोने लगी ।


लाछां के रोने की आवाज सुनकर तेजाजी की नींद खुल गई और कारण जानने के लिए तेजाजी बाहर निकले । रंगबाड़ी के दरवाजे के बाहर बने चबूतरे पर नंदू लेटा हुआ था और उसके नजदीक बैठी लाछां रो रही थी ।


तेजाजी की नींद लाछां के रोने से खुल गई और उन्होंने लाछां से रोने का कारण पूँछा । लाछां ने गायें चोरी होने की बात बताई ।


" तुम चिंता मत करो लाछां ! तेजा जाट तुम्हारी एक एक गाय को वापस लेकर आयेगा ।" तेजाजी ने मूँछ मरोड़ी और अपने पाँचो हथियार ( भाला, तीर, कमान, तलवार और कटार ) उठा लिए । अंधेरे में लीलण तेजा के इशारे पर चोरों के भागने की दिशा में बढ़ गई ।


अंधेरे में चमकती बिजली की चमक में तेजा गायों के निशानों का पीछा करते हुए आगें बढ़ रहा था । वर्तमान सुरसुरा के नजदीक तेजाजी को बिजली गिरने से एक जगह आग लगी हुई दिखाई दी । आग में एक नाग-नागिन का जोड़ा फंसा हुआ था, जिसमें से बिजली गिरने से नागिन मर चुकी थी और नाग भी जलने वाला था । तेजाजी ने जीव दया करते हुए भाले की नोक से नाग को आग के घेरे से बाहर निकाल दिया । नाग को तेजाजी द्वारा खुद को बचाना नागवार गुजरा और गुस्से में तेजाजी को काटना चाहा ।


तेजाजी बोले " हे नागराज ! मैने तो आपका भला ही चाहा है और आप मुझे ही डसना चाहते हैं ?"


" तेजा ! तुमने मेरे को बचा कर बहुत बडा अन्याय किया है । अभी मैं आग में मर जाता तो सीधा बेकुंठ जाता । अब मैं बिना मेरी नागिन के सैकड़ों वर्षों तक जमीन पर घिसटता रहूँगा । मैं तुम्हें डसकर अपना बदला लूँगा ।" नाग बोला


" नागराज ! अभी तो मैं लाछां को दिये वचनों का पालन करने चोरों के पीछे जा रहा हूँ । मैं 8 पहर में वापस लौट कर आऊँगा । मैं चांद, सूरज, और इस खेजड़े के वृक्ष को साक्षी मानकर वचन देता हूँ ।" तेजाजी के वचन देने पर नाग ने रास्ता छोड़ दिया


तेजाजी लीलण पर बैठकर मीणाओं के पीछे चल दिये । वर्तमान तिलोनिया गांव के नजदीक तेजाजी ने दो चोरों को मारा ( वर्तमान में भी यहाँ उनकी देवलिया स्थापित है ) ।


मंडावरिया की पहाड़ियों के नजदीक कालिया मीणा ने डेरा डाल रखा था । तेजाजी ने कालिया मीणा को ललकारा और गायों को छोड़ने का प्रस्ताव रखा । तेजाजी को अकेले देख कालिया मीणा हँसा और ढाई सौ के करीब मीणा साथियों के साथ तेजाजी पर हमला कर दिया ।


विश्व के इतिहास में इससे भयंकर युद्ध नहीं हुआ । एक तरफ ढाई सौ चोर और दूसरी तरफ शेषनाग के अंश तेजाजी जाट । तेजाजी का बिजलसार का भाला चमका और देखते ही देखते मीणाओ की तादात कम होने लगी । कालिया मीणा अपने गिरोह का नाश होते देख मैदान छोड़ भागा । भागते भागते लाछां की गायों में से एक बछड़ा ले गया और मंडावरिया की पहाड़ियों में छुप गया ।


चोरों के भागते ही तेजाजी ने लाछां की गायें संभाली और वापस पनेर की राह पकड़ ली । सवेरा होते होते तेजाजी लाछां की गायों को लेकर वापस पनेर पहुंच गए ।


लाछां अपनी गायों को देख बहुत खुश हुई, परंतु जल्दी ही पता चला कि एक बछड़ा " काणा केरड़ा " गायों के साथ वापस नहीं लौटा । तेजाजी ने लीलण को वापस मोड़ा और "काणा केरड़ा" लेने चल दिये ।


इधर कालिया मीणा तेजाजी के गायें लेकर जाने के बाद मंडावरिया की पहाड़ियों से निकला और सौ के करीब जो जीवित बचे साथी थे उनके साथ नरवर की पहाड़ियों की ओर बढ़ गया । जहाँ उसका पुराना मित्र बालिया काला था जो तेजाजी से उसकी हार का बदला लेने में सहायता कर सकता था ।


तेजाजी जब मंडावरिया की पहाड़ियों के नजदीक पहुंचे वहाँ मारे गए चोरों की लाशों के सिवा कोई नहीं था । तेजाजी ने वहाँ काणा केरडा की तलाश की और जब नहीं मिला तो गीली जमीन पर चोरों के जाने की दिशा में बढ़ गये ।


कालिया मीणा और बालिया काला दोनों नरवर की पहाड़ियों के नजदीक मिले और एक दूसरे का हाल जाना । कालिया ने जब बालिया काला से सहायता मांगी तो उसने मदद करने की हामी भरी । कालिया मीणा के ख़बरियो ने सूचना दी कि तेजाजी उन्हें ढूँढते हुए इसी तरफ आ रहे है ।


कालिया मीणा, तेजाजी के पराक्रम से वाकिफ था । उसने आमने सामने की लड़ाई के बजाय बालिया काला के साथ नरवर की घाटी के दोनों तरफ छुपकर तेजाजी पर हमला किया । दोतफरा और घात लगाकर किये हमले से तेजाजी बुरी तरह घायल हो गए,  जगह जगह से लहू रिसने लगा, परंतु उनका भाला पूरी तेजी से चलता रहा, यहाँ लीलण ने भी अपना द्रोण रूप दिखाया कई चोर लीलण के खुरों का निशाना बने । घायल तेजाजी ने कालिया-बालिया के सम्पूर्ण गिरोह का नाश किया, दोनों पापियों का वध किया और काणा केरडा को लेकर पनेर के लिए रवाना हुए ।


पनेर पहुंचकर तेजाजी ने लाछा गुर्जरी को काणा केरडा सौंपा और लीलण को वापस ( वर्तमान सुरसुरा में ) उस स्थान पर पहुंचे जहां नाग उनका इंतजार कर राजा था । नागराज ने तेजाजी के लहू-लुहान शरीर को देख डसने से मना कर दिया । तब तेजाजी ने अपनी जीभ पर डसने का निवेदन किया । तेजाजी ने अपना भाला आगें किया और नाग ने भाले पर कुंडली मारकर तेजाजी की जीभ पर डस लिया ।


तेजाजी ने वहीं नजदीक ही भेड चरा रहे आंसू देवासी को अपना " मेमद मोलिया " दिया और पेमल तक पहुंचने का वचन लिया । लीलण को खरनाल माता, दादा, बहन और भाई भौजाई को खबर पहुंचाने भेजा ।


वर्तमान में किशनगढ़ तहसील के सुरसुरा गांव में भाद्रपद शुक्ल दशमी संवत 1160 ( 28 अगस्त 1103 ) नागराज के डसने से तेजाजी ने देह त्याग परलोक के लिए गमन किया ।


जब यह बात पेमल को पता चली तो बहुत दुखी हुई और माता बोदलदे से सत का नारियल मांगा और चिता बनाकर तेजाजी के साथ सूर्यदेव की अग्नि से सती हो गई । खरनाल में लीलण को बिना तेजाजी के आये देख बहन राजल सब समझ गई और धुवा तालाब की पाल पर धरती में समा गई । लीलण ने भी तेजाजी के वियोग में तालाब की पाल पर प्राण त्याग दिये ।


TEJAJI

तेजाजी कथा उपसंहार


वीर तेजाजी की कृषि वैज्ञानिक की सोच व योगदान के कारण किसान उनको कृषि का देवता मानने लग गए।नाग के प्रति अटल आस्था को देखते हुए जब भी तेजाजी का चित्र,मूर्ति आदि बनाते है तो उनके साथ काले नाग को कभी नहीं भूलते है।11वीं सदी में गायों के लिए बलिदान को सर्वोच्च बलिदान माना जाता है।


तेजाजी ने अपने कर्मों और आचरण से जनसाधारण को सद्मार्ग को अपनाने उस पर आगें बढ़ने के लिए प्रेरित किया । जात-पांत, छुआ-छूत आदि सामाजिक बुराइयों पर अंकुश लगाया । पण्डों के मिथ्या आडंबरों का विरोध किया, आज भी तेजाजी के मंदिरों में अधिकतर निम्न वर्णों के लोग ही पुजारी का काम करते हैं । इतिहास में समाज सुधार का इतना प्राचीन उदाहरण नहीं है । इस तरह तेजाजी ने अपने सद्कर्मों से जन-साधारण में एक चेतना जागृत की । कर्म, शक्ति, भक्ति व वैराग्य का जैसा तालमेल तेजाजी ने प्रस्तुत किया अन्यत्र दुर्लभ है ।


भाद्रपद शुक्ल दशमी को पूरे भारतवर्ष में प्रतिवर्ष तेजादशमी के रूप में मनाया जाता है । इस दिन जगह जगह पर तेजाजी के मेले लगते हैं, जन्मस्थली खरनाल में लाखों लोग तेजाजी के सम्मान में जुटते है । तेजाजी की गौ रक्षक एवं वचनबद्धता की गाथा लोक गीतों और लोक नाट्य के रूप में पूरे भारतवर्ष में श्रद्धा और भक्तिभाव से गाई व सुनाई जाती है ।


तेजाजी मंदिर सुरसुरा वीडियो लिंक


तेजाजी मंदिर खरनाल वीडियो लिंक


वीर तेजाजी फेसबुक लिंक


चार बुद्धिमान भाई राजस्थानी लोककथा

चार बुद्धिमान भाई राजस्थानी लोककथा


एक नगर में चार भाई रहते थे । चारों ही भाई अक्ल के मामले में एक से बढ़कर एक थे । उनकी अक्ल के चर्चे आस-पास के गांवों व नगरों में फैले थे, उनमें से एक भाई का नाम सौ बुद्धि, दूजे का नाम हजार बुद्धि, तीसरे का नाम लाख बुद्धि, तो चौथे भाई का नाम करोड़ बुद्धि था ।

एक दिन चारों ने आपस में सलाह कर किसी बड़े राज्य की राजधानी में कमाने जाने का निर्णय किया । क्योंकि दूसरे बड़े नगर में जाकर अपनी बुद्धि से कमायेंगे तो उनकी बुद्धि की भी परीक्षा होगी और यह भी पता चलेगा कि हम कितने अक्लमंद है ? इस तरह चारों ने आपस में विचार विमर्श कर किसी बड़े शहर को जाने के लिए घोड़े तैयार कर चल पड़ते है ।

काफी रास्ता तय करने के बाद वे चले जा रहे थे कि अचानक उनकी नजर रास्ते में उनसे पहले गए किसी ऊंट के पैरों के निशानों पर पड़ी,

" ये जो पैरों के निशान दिख रहे है वे ऊंट के नहीं ऊँटनी के है ।" सौ बुद्धि निशान देख अपने भाइयों से बोला

" तुमने बिल्कुल सही कहा, ये ऊँटनी के ही पैरों के निशान है और ये ऊँटनी बायीं आँख से काणि भी है ।" हजार बुद्धि ने आगे कहा

लाख बुद्धि बोला " तुम दोनों सही हो, पर एक बात मैं बताऊँ ? इस ऊँटनी पर जो दो लोग सवार है उनमें एक मर्द व दूसरी औरत है ।“

करोड़ बुद्धि कहने लगा " तुम तीनों का अंदाजा सही है, और ऊँटनी पर जो औरत सवार है वह गर्भवती है ।"


अब चारों भाइयों ने ऊंट के उन पैरों के निशानों व आस-पास की जगह का निरीक्षण कर व देखकर अपनी बुद्धि लगा अंदाजा तो लगा लिया पर यह अंदाजा सही लगा या नहीं इसे जांचने के लिए आपस में चर्चा कर ऊंट के पैरों के पीछे-पीछे अपने घोड़ों को दौड़ा दिए, ताकि ऊंट सवार का पीछा कर उस तक पहुँच अपनी बुद्धि से लगाये अंदाजे की जाँच कर सके ।

थोड़ी ही देर में वे ऊंट सवार के आस-पास पहुँच गए । ऊंट सवार अपना पीछा करते चार घुड़सवार देख घबरा गया कहीं डाकू या बदमाश नहीं हो, सो उसने भी अपने ऊंट को दौड़ा दिया ।

ऊंट सवार अपने ऊंट को दौड़ाता हुआ आगे एक नगर में प्रवेश कर गया । चारों भाई भी उसके पीछे पीछे ही थ । नगर में जाते ही ऊंट सवार ने नगर कोतवाल से शिकायत की " मेरे पीछे चार घुड़सवार पड़े है कृपया मेरी व मेरी पत्नी की उनसे रक्षा करें ।"

पीछे आते चारों भाइयों को नगर कोतवाल ने रोक पूछताछ शुरू कर दी कि कही कोई लुटेरे तो नहीं ? पूछताछ में चारों भाइयों ने बताया कि वे तो नौकरी तलाशने घर से निकले है यदि इस नगर में कही कोई रोजगार मिल जाए तो यही कर लेंगे । कोतवाल ने चारों के हावभाव व उनका व्यक्तित्व देख सोचा ऐसे व्यक्ति तो अपने राज्य के राजा के काम के हो सकते है सो वह उन चारों भाइयों को राजा के पास ले आया, साथ उनके बारे में जानकारी देते हुए कोतवाल ने उनके द्वारा ऊंट सवार का पीछा करने वाली बात बताई ।

राजा ने अपने राज्य में कर्मचारियों की कमी के चलते अच्छे लोगों की भर्ती की जरुरत भी बताई पर साथ ही उनसे उस ऊंट सवार का पीछा करने का कारण भी पुछा

सबसे पहले सौ बुद्ध बोला " महाराज ! जैसे हम चारों भाइयों ने उस ऊंट के पैरों के निशान देखे अपनी-अपनी अक्ल लगाकर अंदाजा लगाया कि- ये पैर के निशान ऊँटनी के होने चाहिए, ऊँटनी बायीं आँख से काणि होनी चाहिए, ऊँटनी पर दो व्यक्ति सवार जिनमें एक मर्द दूसरी औरत होनी चाहिए और वो सवार स्त्री गर्भवती होनी चाहिए ।"

इतना सुनने के बाद तो राजा भी आगे सुनने को बड़ा उत्सुक हुआ, और उसने तुरंत ऊंट सवार को बुलाकर पुछा " तूं कहाँ से आ रहा था और किसके साथ ?"

ऊंट सवार कहने लगा " हे अन्नदाता ! मैं तो अपनी गर्भवती घरवाली को लेने अपनी ससुराल गया था वही से उसे लेकर आ रहा था ।"

राजा " अच्छा बता क्या तेरी ऊँटनी बायीं आँख से काणी है ?"

ऊंट सवार " हां ! अन्नदाता, मेरी ऊँटनी बायीं आँख से काणी है ।“

राजा ने अचंभित होते हुए चारों भाइयों से पुछा " आपने कैसे अंदाजा लगाया ? विस्तार से सही सही बताएं ।"

सौ बुद्धि बोला " उस पैरों के निशान के साथ मूत्र देख उसे व उसकी गंध पहचान मैंने अंदाजा लगाया कि ये ऊंट मादा है ।"

हजार बुद्धि बोला " रास्ते में दाहिनी और जो पेड़ पौधे थे ये ऊँटनी उन्हें खाते हुई चली थी पर बायीं और उसने किसी भी पेड़-पौधे की पत्तियों पर मुंह तक नहीं मारा, इसलिए मैंने अंदाजा लगाया कि जरुर यह बायीं आँख से काणी है इसलिए उसने बायीं और के पेड़-पौधे देखे ही नहीं तो खाती कैसे ?"

लाख बुद्धि बोला " ये ऊँटनी सवार एक जगह उतरे थे अतः: इनके पैरों के निशानों से पता चला कि ये दो जने है और पैरों के निशान भी बता रहे थे कि एक मर्द के है व दूसरे स्त्री के |"

आखिर में करोड़ बुद्धि बोला-" औरत के जो पैरों के निशान थे उनमें एक भारी पड़ा दिखाई दिया तो मैंने सहज ही अनुमान लगा लिया कि हो न हो ये औरत गर्भवती है ।"

राजा ने उनकी अक्ल पहचान उन्हें अच्छे वेतन पर अपने दरबार में नौकरी देते हुए फिर पुछा -

" आप लोगों में और क्या क्या गुण व प्रतिभा है ?"

सौ बुद्धि बोला " मैं जिस जगह को चुनकर तय कर बैठ जाऊं तो किसी द्वारा कैसे भी उठाने की कोशिश करने पर नहीं उठूँ ।"

हजार बुद्धि " मुझमे भोज्य सामग्री को पहचानने की बहुत बढ़िया प्रतिभा है ।"

लाख बुद्धि " मुझे बिस्तरों की बहुत बढ़िया पहचान है ।"

करोड़ बुद्धि " मैं किसी भी रूठे व्यक्ति को चुटकियों में मनाकर ला सकता हूँ ।"

राजा ने मन ही मन एक दिन उनकी परीक्षा लेने की सोची । एक दिन सभी लोग महल में एक जगह एक बहुत बड़ी दरी पर बैठे थे, साथ में चारों अक्ल बहादुर भाई भी,  राजा ने हुक्म दिया कि “ इस दरी को एक बार उठाकर झाड़ा जाय, दरी उठने लगी तो सभी लोग उठकर दरी से दूर हो गए पर सौ बुद्धि दरी पर ऐसी जगह बैठा था कि वह अपने नीचे से दरी खिसकाकर बिना उठे ही दरी को अलग कर सकता था सो उसने दरी का पल्ला अपने नीचे से खिसकाया और बैठा रहा । राजा समझ गया कि ये उठने वाला नहीं ।


शाम को राजा ने भोजन पर चारों भाइयों को आमंत्रित किया और भोजन करने के बाद चारों भाइयों से भोजन की क्वालिटी के बारे में पुछा ।

तीन भाइयों ने भोजन के स्वाद उसकी गुणवत्ता की बहुत सरहना की पर हजार बुद्धि बोला " माफ़ करें हुजूर ! खाने में चावल में गाय के मूत्र की बदबू थी ।"

राजा ने रसोईघर के मुखिया से पुछा " सच सच बता कि चावल में गौमूत्र की बदबू कैसे ?”

रसोई घर का हेड कहने लगा " गांवों से चावल लाते समय रास्ते में वर्षा आ गयी थी सो भीगने से बचाने को एक पशुपालन के बाड़े में गाडियां खड़ी करवाई थी, वहीं चावल पर एक गाय ने मूत्र कर दिया था, हुजूर मैंने चावल को बहुत धुलवाया भी पर कहीं से थोड़ी बदबू रह ही गयी ।"


हजार बुद्धि की भोजन पारखी प्रतिभा से राजा बहुत खुश हुआ और रात्रि को सोते समय चारों भाइयों के लिए गद्दे राजमहल से भिजवा दिए । जिन पर चारों भाइयों ने रात्रि विश्राम किया ।

सुबह राजा के आते ही लाख बुद्धि ने कहा " बिस्तर में खरगोश की पुंछ है जो रातभर मेरे शरीर में चुभती रही ।"

राजा ने बिस्तर फड़वाकर जांच करवाई तो उसने वाकई खरगोश की पुंछ निकली, राजा लाख बुद्धि के कौशल से भी बड़ा प्रभावित हुआ ।


पर अभी करोड़ बुद्धि की परीक्षा बाकी थी, सो राजा ने रानी को बुलाकर कहा " करोड़ बुद्धि की परीक्षा लेनी है आप रूठकर शहर से बाहर बगीचे में जाकर बैठ जाएं करोड़ बुद्धि आपको मनाने आयेगा पर किसी भी सूरत में मानियेगा मत ।"

और रानी रूठकर बाग में जा बैठी, राजा ने करोड़ बुद्धि को बुला रानी को मनाने के लिए कहा ।

करोड़ बुद्धि बाजार गया वहां से पड़ले का सामान व दुल्हे के लिए लगायी जाने वाली हल्दी व अन्य शादी का सामान ख़रीदा और बाग के पास से गुजरा वहां रानी को देखकर उससे मिलने गया ।

रानी ने पुछा " ये शादी का सामान कहाँ ले जा रहे है ।"

करोड़ बुद्धि बोला " आज राजा जी दूसरा ब्याह रचा रहे है यह सामान उसी के लिए है, राजमहल ले कर जा रहा हूँ ।“

रानी ने पुछा " क्या सच में राजा दूसरी शादी कर रहे है ?"

करोड़ बुद्धि " सही में ऐसा ही हो रहा है तभी तो आपको राजमहल से दूर बाग में भेज दिया गया है ।"

इतना सुन राणी घबरा गयी कि कहीं वास्तव में ऐसा ही ना हो रहा हो, और वह तुरंत अपना रथ तैयार करवा करोड़ बुद्धि के आगे आगे महल की ओर चल दी ।

महल में पहुँच करोड़ बुद्धि ने राजा को अभिवादन कर कहा " महाराज ! राणी को मना लाया हूँ ।"

राजा ने देखा रानी सीधे रथ से उतर गुस्से में भरी उसकी और ही आ रही थी, और आते ही राजा से लड़ने लगी कि " आप तो मुझे धोखा दे रहे थे, पर मेरे जीते जी आप दूसरा ब्याह नहीं कर सकते ।"

राजा भी राणी को अपनी सफाई देने में लग गया ।

और इस तरह चारों अक्ल बहादुर भाई राजा की परीक्षा में सफल रहे ।

चार आने का हिसाब हिंदी लोककथा

तिलस्वा महादेव भीलवाड़ा

तिलस्वा महादेव भीलवाड़ा

तिलस्वां महादेव मन्दिर

तिलस्वां महादेव मंदिर भीलवाड़ा जिले में बिजोलिया के पास तिलस्वां गांव में स्थित है । यह मंदिर भीलवाड़ा से लगभग 95 किमी दूर है । तिलस्वां महादेव मंदिर प्राचीन ऐतिहासिक काल के दौरान बनाया गया था, यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और उनकी मुख्य मूर्ति मंदिर क्षेत्र के अंदर स्थापित है । भगवान शिव की पूजा आगंतुकों द्वारा बहुत श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है । मंदिर की वास्तुकला बहुत ही उत्तम है और यह प्राचीन ऐतिहासिक काल की महान कला को स्पष्ट रूप से दर्शाती है ।

तिलस्वां महादेव मन्दिर के पीछे मान्यता ये भी है कि मध्यप्रदेश के हवन नामक राजा को कुष्ठ रोग हो जाने पर उसने देश मे कई तीर्थस्थलों का तीर्थाटन किया, मगर उसे कही भी कुष्ठ रोग से निजात नही मिल सकी तब उसे एक महात्मा ने बताया कि बिजोलिया से कुछ ही दूरी पर तिलस्वां में पवित्र कुंड है ।

तुम वहां पवित्र केसर गार का लेप करके वहां स्नान करके विधिवत पूजा अर्चना करके महादेव से प्रार्थना करोगे तो ये गम्भीर बीमारी दूर हो जाएगी और तुम्हारा कष्ट हमेशा के लिए दूर हो जायेगा ।

महात्मा के बताए अनुसार राजा ने तिलस्वांनाथ के नाम पर हवन किया व यहां की पवित्र केसर गार का लेप कर कुंड में स्नान करने व महादेव की आराधना से उसे चमत्कारी लाभ हुआ । तब से लेकर आज तक यहां देश भर से असाध्य बीमारियों से ग्रस्त रोगी आते है वे यहां केसर गार का लेप कर कुण्ड में आस्था की डुबकी लगाते है और दाद खाज खुजली, जैसी खतरनाक बीमारियों से निजात पा रहे हैं ।

मंदिर क्षेत्र के बगल में वही कुंड है, जो अपने पवित्र जल के लिए प्रसिद्ध है । इसलिए, कई लोग मंदिर में आते हैं और अपनी बीमारियों को ठीक करने के लिए पवित्र कुंड में स्नान करते हैं । महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में हर साल एक बड़े मेले का आयोजन किया जाता है ।

तिलस्वां महादेव मंदिर एक आदर्श स्थान है जहाँ श्रद्धालु आत्मिक शांति प्राप्त कर सकते हैं । तिलस्वां महादेव मंदिर साल भर पर्यटकों के लिए खुला रहता है । मंदिर में सुबह 5:00 बजे से 11:45 बजे तक और शाम 4:00 बजे से रात 8:00 बजे तक दर्शन किए जा सकते हैं । यहां माता अन्नपूर्णा का मंदिर, तोरण द्वार, शनि मंदिर, विष्णु भगवान का मंदिर, गणेश मंदिर, महाकाल मंदिर, सूर्य मंदिर है । यहां मंदिर में भगवान शंकर की पूजा होती हैं यहां स्थापित शिव व पार्वती की मूर्तियां आदि काल से स्थापित है । तिलस्वां महादेव में मंगला आरती दर्शन सुबह चार बजे, राज आरती दर्शन सुबह नौ बजे, राज भोग सुबह ग्यारह बजे व संध्या आरती दर्शन सूर्यास्त पर होती है ।

यहां कुंड के बीच जाने के लिए सुंदर पुलिया का निर्माण करवाया गया है तथा उनके मध्य में एक और कुंड यानि बावड़ी है । इसके सम्मुख एक संगमरमर से गंगा माता मंदिर बना हुआ है ।

सालभर लाखों श्रद्धालु तिलस्वां महादेव मंदिर के दर्शन के लिए पहुंचते हैं । राजस्थान के अलावा अन्य राज्यों से भी भक्तजन यहां आकर पूजा-अर्चना करते कर परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं । सावन मास के प्रत्येक सोमवार को श्रद्धालु जलाभिषेक व धार्मिक अनुष्ठान आदि कर भोलेनाथ को स्मरण करते हैं । इसके अलावा हर साल महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर विशाल मेला लगाया जाता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं ।

तिलस्वां महादेव मंदिर रमणीक होने के साथ भोले के भक्तों के लिए उनकी अटूट आस्था का केन्द्र भी है । यही वजह है कि श्रावण मास में यहां का नजारा अद्भुत होता है । यहां दिनभर भक्ति संगीत के साथ अनुष्ठान और पूजा-अर्चना का कार्यक्रम चलता है । भोलेनाथ के जयकारों से मंदिर परिसर गुंजायमान रहता है ।

तिलस्वां महादेव मंदिर के बाहर की तरफ भोलेनाथ की विशालकाय मूर्ति लगभग 30 फुट ऊंची स्थापित है जो भक्तों को आकर्षित करती है ।

जय भोलेनाथ !!!

TILASWA MAHADEV MANDIR



चार आने का हिसाब लोककथा

चार आने का हिसाब



बहुत समय पहले की बात है, चंदनपुर का राजा बड़ा प्रतापी था, दूर-दूर तक उसके राज्य की समृध्दि के चर्चे होते थे, उसके महल में हर एक सुख-सुविधा की वस्तु उपलब्ध थी पर फिर भी अंदर से उसका मन अशांत रहता था ।

उसने कई ज्योतिषियों और पंडितों से इसका कारण जानना चाहा, किसी ने उसे कोई अंगूठी पहनाई तो किसी ने यज्ञ कराए, पर फिर भी राजा का दुःख दूर नहीं हुआ, उसे शांति नहीं मिली ।

एक दिन भेष बदल कर राजा अपने राज्य की सैर पर निकला । घूमते-घूमते वह एक खेत के निकट से गुजरा, तभी उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी, किसान ने फटे-पुराने वस्त्र धारण कर रखे थे और वह पेड़ की छाँव में बैठ कर भोजन कर रहा था ।

किसान के वस्त्र देख राजा के मन में आया कि वह किसान को कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दे ताकि उसके जीवन में कुछ खुशियां आ पाये ।

राजा ने किसान से कहा ” मैं एक राहगीर हूँ ! मुझे तुम्हारे खेत पर ये चार स्वर्ण मुद्राएँ गिरी मिलीं है, क्योंकि यह खेत तुम्हारा है इसलिए ये मुद्राएं तुम ही रख लो ।“

किसान ने गर्दन हिलाते हुए कहा ” ना – ना सेठ जी ! ये मुद्राएं मेरी नहीं हैं, इसे आप ही रखें या किसी और को दान कर दें, मुझे इनकी कोई आवश्यकता नहीं ।“

किसान की यह प्रतिक्रिया राजा को बड़ी अजीब लगी, वह बोला ” धन की आवश्यकता किसे नहीं होती भला आप लक्ष्मी को ना कैसे कर सकते हैं ?”

“ सेठ जी ! मैं रोज चार आने कमा लेता हूँ, और उतने में ही प्रसन्न रहता हूँ… !“, किसान बोला

“ क्या ? आप सिर्फ चार आने की कमाई करते हैं, और उतने में ही प्रसन्न रहते हैं, यह कैसे संभव है ?” , राजा ने अचरज से पुछा

” सेठ जी !” किसान बोला “ प्रसन्नता इस बात पर निर्भर नहीं करती की आप कितना कमाते हैं या आपके पास कितना धन है, प्रसन्नता उस धन के प्रयोग पर निर्भर करती है ।“

” तो तुम इन चार आने का क्या-क्या कर लेते हो ?” राजा ने उपहास के लहजे में प्रश्न किया

किसान भी बेकार की बहस में नहीं पड़ना चाहता था उसने आगे बढ़ते हुए उत्तर दिया ” इन चार आनो में से एक मैं कुएं में डाल देता हूँ, दूसरे से कर्ज चुका देता हूँ, तीसरा उधार में दे देता हूँ और चौथा मिट्टी में गाड़ देता हूँ ।”

राजा सोचने लगा, उसे यह उत्तर समझ नहीं आया । वह किसान से इसका अर्थ पूछना चाहता था, पर वो जा चुका था ।

राजा ने अगले दिन ही सभा बुलाई और पूरे दरबार में कल की घटना कह सुनाई और सबसे किसान के उस कथन का अर्थ पूछने लगा ।

दरबारियों ने अपने-अपने तर्क पेश किये पर कोई भी राजा को संतुष्ट नहीं कर पाया, अंत में किसान को ही दरबार में बुलाने का निर्णय लिया गया ।

बहुत खोज-बीन के बाद किसान मिला और उसे कल की सभा में प्रस्तुत होने का निर्देश दिया गया ।

राजा ने किसान को उस दिन अपने भेष बदल कर भ्रमण करने के बारे में बताया और सम्मान पूर्वक दरबार में बैठाया ।

” मैं तुम्हारे उत्तर से प्रभावित हूँ, और तुम्हारे चार आने का हिसाब जानना चाहता हूँ, बताओ, तुम अपने कमाए चार आने किस तरह खर्च करते हो जो तुम इतना प्रसन्न और संतुष्ट रह पाते हो ?” राजा ने प्रश्न किया

किसान बोला ” हुजूर ! जैसा की मैंने बताया था, मैं एक आना कुएं में डाल देता हूँ, यानी अपने परिवार के भरण-पोषण में लगा देता हूँ, दूसरे से मैं कर्ज चुकता हूँ, यानी इसे मैं अपने वृद्ध माँ-बाप की सेवा में लगा देता हूँ, तीसरा मैं उधार दे देता हूँ, यानी अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में लगा देता हूँ, और चौथा मैं मिट्टी में गाड़ देता हूँ, यानी मैं एक पैसे की बचत कर लेता हूँ ताकि समय आने पर मुझे किसी से माँगना ना पड़े और मैं इसे धार्मिक ,सामाजिक या अन्य आवश्यक कार्यों में लगा सकूँ ।“

राजा को अब किसान की बात समझ आ चुकी थी । राजा की समस्या का समाधान हो चुका था, वह जान चुका था की यदि उसे प्रसन्न एवं संतुष्ट रहना है तो उसे भी अपने अर्जित किये धन का सही-सही उपयोग करना होगा ।

मित्रों, देखा जाए तो पहले की अपेक्षा लोगों की आमदनी बढ़ी है पर क्या उसी अनुपात में हमारी प्रसन्नता भी बढ़ी है ? यकीनन नहीं !

पैसों के मामलों में हम कहीं न कहीं गलती कर रहे हैं , लाइफ को बैलेंस बनाना ज़रूरी है और इसके लिए हमें अपनी आमदनी और उसके इस्तेमाल पर ज़रूर गौर करना चाहिए, नहीं तो भले हम लाखों रुपये कमा लें पर फिर भी प्रसन्न एवं संतुष्ट नहीं रह पाएंगे !

मेवाड़ की आंख कुम्भलगढ़ दुर्ग का इतिहास

कुम्भलगढ़ दुर्ग का इतिहास

KUMBHALGARH FORT

कुंभलगढ़ दुर्ग राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित है, अरावली पर्वतमाला की तलहटी पर बना हुआ यह किला पर्वतमाला की पहाड़ी चोटियों से घिरा हुआ है, किले की सागर तल से ऊँचाई 1,914 मीटर है । यह आकर्षक किला एक जंगल के बीच स्थित है, जिसको एक वन्यजीव अभयारण्य में बदल दिया है । यह किला चित्तौड़गढ़ के पश्चात राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे सुदृढ किला है, जिसको देखकर कोई भी इसकी तरफ आकर्षित हो सकता है । अगर आप राजस्थान या इसके उदयपुर शहर की यात्रा कर रहे हैं तो कुम्भलगढ़ किला देखें बिना आपकी यात्रा अधूरी है ।

चित्तौड़गढ़ के किले का इतिहास

यह राजस्थान का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है । कुंभलगढ़ का किला राजस्थान राज्य के उन पांच पहाड़ी किलों में से एक है, जिसको साल 2013 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था । इस किले का निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया था । किले के चारों तरफ 36 किलोमीटर लंबी दीवार है जिसकी वजह से इस किले पर विजय पाना काफी मुश्किल है, इसी कारण इस किले को ' अजयगढ ‘ भी कहा जाता था । कुंभलगढ़ के किले की दीवार चीन की दीवार के पश्चात विश्व कि दूसरी सबसे बडी दीवार है ।

इस किले का प्राचीन नाम मछिन्द्रपुर था, जबकि इतिहासकार साहिब हकीम ने इसे माहौर का नाम दिया था । माना जाता है की वास्तविक किले का निर्माण मौर्य साम्राज्य के राजा सम्प्रति ने छठी शताब्दी में किया था । सन 1303  में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण करने से पहले का इतिहास आज भी अस्पष्ट है ।

वर्तमान कुम्भलगढ़ किले का निर्माण सिसोदिया राजाओं ने करवाया था और इसके आर्किटेक्ट एरा मदन था ।

कुम्भलगढ किले को “ मेवाड की आँख “ भी कहा जाता है, यह दुर्ग कई दुर्गम घाटियों व पहाड़ियों को मिला कर बनाया गया है । इससे किले को प्राकृतिक सुरक्षात्मक आधार मिलता है ।

कुंभलगढ़ किले के अधिकतर ऊँचे स्थानों पर महल, मंदिर व आवासीय इमारते बनायीं गई, जबकि समतल भूमि का उपयोग खेती के लिए किया जाता था । वहीं ढलान वाले इलाकों में तालाबों का निर्माण कर इस दुर्ग को स्वाबलंबी बनाया गया ।

कुंभलगढ़ किले के अंदर ही  कटारगढ़ किला है जो सात विशाल द्वारों व मजबूत दीवारों से घिरा हुआ है । कटारगढ़ के शीर्ष भाग में बादल महल व कुम्भा महल स्थित है ।

कुंभलगढ़ दुर्ग में ही महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था और एक तरह से यह किला मेवाड़ रियासत की संकटकालीन राजधानी रहा है । महाराणा कुम्भा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक जब भी मेवाड़ पर आक्रमण हुए, तब राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा । यहीं पर कुंवर पृथ्वीराज और राणा सांगा का बचपन बीता था । 

चित्तौड़गढ़ के किले का इतिहास

पन्ना धाय ने भी संकट के समय महाराणा उदय सिंह को इसी दुर्ग में छिपा कर पालन पोषण किया था । महाराणा प्रताप ने भी हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात इसी किले में शरण ली थी ।

इस दुर्ग के बनने के बाद ही इस पर आक्रमण शुरू हो गए लेकिन एक बार को छोड़ कर ये दुर्ग प्राय: अजय ही रहा है, लेकिन इस दुर्ग की कई दुखांत घटनाये भी है जिस महाराणा कुम्भा को कोई नहीं हरा सका वही शुरवीर महाराणा कुम्भा इसी दुर्ग में अपने पुत्र ऊदा सिंह द्वारा राज्य पिपासा में मारे गए । कुल मिलाकर दुर्ग ऐतिहासिक विरासत की शान और शूरवीरों की तीर्थ स्थली रहा है 

     इस किले की ऊँचाई के संबंध में अबुल फजल ने लिखा है कि " यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की तरफ देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है ।"

     कर्नल जेम्स टॉड ने दुर्भेद्य स्वरूप की दृष्टि से चित्तौड़ के बाद इस दुर्ग को रखा है तथा इस दुर्ग की तुलना ( सुदृढ़ प्राचीर, बुर्जों तथा कंगूरों के कारण ) ' एट्रस्कन ' से की है।

किले का स्थापत्य व अन्य

KUMBHALGARH FORT

दुर्ग की प्राचीर 36 मील लम्बी व 7 मीटर चौड़ी है जिस पर चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं, इसलिए इसे भारत की महान दीवार के नाम से जाना जाता है ।

किले के उत्तर की तरफ का पैदल रास्ता ' टूट्या का होड़ा ' तथा पूर्व की तरफ हाथी गुढ़ा की नाल में उतरने का रास्ता दाणीवहा ' कहलाता है। किले के पश्चिम की तरफ का रास्ता ' हीराबारी ' कहलाता है जिसमें थोड़ी ही दूर पर किले की तलहटी में महाराणा रायमल के ' कुँवर पृथ्वीराज की छतरी' बनी है, इसे ' उड़वाँ राजकुमार ' के नाम से जाना जाता है । पृथ्वीराज स्मारक पर लगे लेख में पृथ्वीराज के घोड़े का नाम ' साहण ' दिया गया है।

किले में घुसने के लिए आरेठपोल, हल्लापोल, हनुमान पोल तथा विजयपोल  आदि दरवाजे हैं । कुम्भलगढ़ के किले के भीतर एक लघु दुर्ग कटारगढ़' स्थित है जिसमें ' झाली रानी का मालिया ' महल प्रमुख है ।


कुम्भलगढ़ किले की दीवार का निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया था। यह विश्व कि दूसरी सबसे लम्बी दीवार है ।


गणेश मंदिर

गणेश मंदिर को किले के अंदर बने सभी मंदिरों में सबसे प्राचीन है, जिसको 12 फीट के मंच पर बनाया गया है । इस किले के पूर्वी किनारे पर 1458 ईसवी दौरान निर्मित नील कंठ महादेव मंदिर स्थित है ।

वेदी मंदिर

राणा कुंभा द्वारा निर्मित वेदी मंदिर हनुमान पोल के पास स्थित है, जो किले में पश्चिम दिशा की ओर है । वेदी मंदिर एक तीन-मंजिला अष्ट कोणीय जैन मंदिर है जिसमें छत्तीस स्तंभ हैं, मंदिर को महाराणा फतेह सिंह द्वारा पुर्ननिर्माण किया गया था ।

पार्श्वनाथ मंदिर

पार्श्व नाथ मंदिर का निर्माण 1513 ईसवी में किया गया । किले में बावन जैन मंदिर और गोलरा जैन मंदिर प्रमुख जैन मंदिर हैं ।

बावन देवी मंदिर

बावन देवी मंदिर का नाम एक ही परिसर में 52 मंदिरों से निकला है । इस मंदिर के केवल एक प्रवेश द्वार है । बावन मंदिरों में से दो बड़े आकार के मंदिर हैं जो केंद्र में स्थित हैं । बाकी 50 मंदिर छोटे आकार के हैं ।

कुंभ महल

गडा पोल के करीब स्थित कुंभ महल राजपूत वास्तुकला के बेहतरीन संरचनाओं में से एक है ।

बादल महल

राणा फतेह सिंह द्वारा निर्मित यह किले का उच्चतम बिंदु है । इस महल तक पहुंचने के लिए संकरी सीढ़ियों से छत पर चढ़ना पड़ता है ।

कुम्भलगढ़ किले में घूमने का समय

सप्ताह में सभी दिन सुबह 9 से शाम के 6 बजे तक । सम्पूर्ण कुम्भलगढ़ किले में अच्छे से घूमने के लिए कम से कम तीन घंटे चाहिए ।

कुम्भलगढ़ किले में प्रवेश करने की फीस

1. भारतीय दर्शक  10 ₹

2. विदेशी दर्शक  100 ₹

3. किले में कैमरा 25 ₹

Kumbhalgarh

कुम्भलगढ़ जाने का रास्ता

कुम्भलगढ़ किले से निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर के पास डबोक है जो कुम्भलगढ़ से करीब 95 किमी की दूरी पर स्थित है । डबोक एयरपोर्ट पहुँचने के बाद आप टैक्सी से कुम्भलगढ़ पहुँच सकते है ।

कुम्भलगढ़ से नजदीकी रेल्वे स्टेशन भी उदयपुर ही है जहाँ से आप टैक्सी या बस में कुम्भलगढ़ पहुँच सकते है ।

राजस्थान के सभी प्रमुख शहरों से कुम्भलगढ़ के नियमित बस सुविधा उपलब्ध है । आप बस से वहां पहुँच सकते है ।



बगड़ावत भारत भाग 3 - भगवान देवनारायण जी जन्म कथा भाग 3

भगवान देवनारायण जी जन्म कथा भाग 3

बगड़ावत भारत कथा

बगड़ावत भारत कथा भाग 2 लिंक

कथा के अनुसार सवाई भोज को बाबा रुपनाथ की गुफा से भी काफी सारा धन मिलता है जिनमें एक जयमंगला हाथी, एक सोने का खांडा, बुली घोड़ी, सुरह गाय, सोने का पोरसा, कश्मीरी तम्बू इत्यादि । दुर्लभ चीजें लेकर सवाई भोज घर आ जाते हैं । घर आकर सवाईभोज बाबा रुपनाथ व सोने के पोरसे की सारी घटना अपने भाइयों को बताते हैं और इस अथाह सम्पत्ति का क्या करें ? इस बात पर विचार करते हैं ।

बगड़ावतों में सबसे बड़े भाई तेजाजी बगड़ावत कहते हैं कि हमें इस धन को जमीन में छुपा देना चाहिए और हमेशा की तरह जब अकाल पड़ेगा तब इस धन का उपयोग करेंगे और इस धन को कई गुना बढ़ा लेंगे ।

इस पर सवाई भोज कहते हैं कि भाई आपने तो अपने नाना की तरह ही बणिया बुद्धि का उपयोग कर धन बढ़ाने का सोचा है, हमे इस धन को जन कल्याण के कार्यों में खर्च करना चाहिए और लोगों को खुले हाथ से दान करना चाहिए ।

इसके पश्चात सवाई भोज के कहे अनुसार ही बगड़ावत अपना पशुधन बढ़ाते हैं । सभी भाई अपने लिये घोड़े खरीदते हैं और घोड़ों के लिये सोने के जेवर कच्चे सूत के धागे में पिरोकर बनाते थे, ताकि घोड़े जब दौड़ें तो उनके जेवर टूट कर गिरें और गरीब लोग उन्हें उठाकर अपना परिवार पाल सकें । आज भी ये जेवर कभी-कभी बगड़ावतों के गांवो से मिलते हैं । बगड़ावत उस धन से बहुत सी जमीन खरीदते हैं, और अपने अलग-अलग गांव बसाते हैं ।

सवाई भोज अपने बसाये गांव का नाम गोठां रखते हैं । इसके अलावा बगड़ावत उस धन से काफी धार्मिक और जनहित के काम भी करते हैं, तालाब, बावड़ियां और कुवों का निर्माण करवाते हैं । तामेसर कि बावड़ी उन्ही के द्वारा बनवाई गई थी जिसमें आज भी पानी समाप्त नहीं होता ।

अधिक धन के साथ व्यसन भी आ ही जाते हैं, बगड़ावतों के पास अथाह धन होने से वो शराब खरीदने पर भी बेइंतहा खर्च करते हैं और अपने घोड़ो तक को भी शराब पिलाते हैं ।

बगड़ावतों की दानवीरता के किस्से राण के राव दुर्जनसार तक भी पहुंचते हैं । इस कारण राण का राजा बगड़ावतों को राण में आने का निमंत्रण भेजता है, निमंत्रण मिलने पर सवाई भोज अपने भाइयों के साथ अपने राजा से मिलने जाने की योजना बनाते हैं ।

दूसरे दिन बगड़ावतों को अपने घोड़ो को श्रृंगारते देख साडू खटाणी अपने देवर नियाजी से पूछती है “ देवरजी ! सुबह सुबह कहाँ जाने की तैयारी है ?“

नियाजी उन्हें बताते हैं की हम सभी भाई राण के राव दुर्जनसार के निमंत्रण पर राण जा रहे हैं । श्रृंगार करके बगड़ावत, छोछू भाट के साथ राण की तरफ निकल पड़ते हैं, रास्ते में उन्हें पनिहारियाँ मिलती हैं और बगड़ावतों के रुप रंग को देखकर आपस में चर्चा करने लगती हैं ।

राण में प्रवेश करने से पहले ही बगड़ावतों को एक बाग दिखाई देता है जिसका नाम नौलखा बाग था । वहां रुक कर सभी भाईयों की विश्राम करने की इच्छा होती है ।

यह नौलखा बाग राव दुर्जनसार की जागीर होती है, और बाग का माली इन अनजान राहगीरों को बाग में रुकने से मना कर देता है । तब नियाजी माली को कहते हैं कि पैसे लेकर हमें बैठने दो, लेकिन माली नहीं मानता, जिससे नियांजी को गुस्सा आ जाता है और माली को पीटकर वहां से भगा देते हैं । उसके बाद नौलखा बाग का फाटक तोड़कर उसमें घुस जाते हैं ।

इधर बाग का माली मार खाकर राव दुर्जनसार के पास पहुंचता है और बगड़ावतों की शिकायत करता है ।

इधर बगड़ावतों को नौलखा बाग के पास दो शराब से लबालब भरी हुई झीलों सावन-भादवा का पता चलता हैं । ये शराब की झीलें पातु कलाली की होती है जो दारु बनाने का व्यवसाय करती थी ।

सवाई भोज शराब लाने के लिए नियाजी और छोछू भाट को पातु कलाली के पास भेजते हैं । पातु कलाली के घर के बाहर एक नगाड़ा रखा होता है, जिसे दारु खरीदने वाला बजाकर पातु कलाली को बताता है कि कोई दारु खरीदने के लिये आया है । 

नगाड़ा बजाने का नियम यह था कि जो जितनी बार नगाड़े पर चोट करेगा, वह उतने लाख की दारु पातु से खरीदेगा, इससे अनजान छोछू भाट तो नगाड़े पर चोट पर चोट करें जाता हैं । नगाड़े पर हो रही लगातार चोटों को देख पातु सोचती है कि इतनी दारु खरीदने के लिये आज कौन आया है ? पातु कलाली बाहर आकर देखती है कि दो अनजान घुड़सवार दारु खरीदने आये हैं ।

पातु उन्हें देखकर कहती है कि मेरी दारु मंहगी है । पूरे मेवाड में कहीं नहीं मिलेगी । केसर कस्तूरी से भी अच्छी है यह, तुम नहीं खरीद सकोगे ।

नियाजी अपने घोड़े के सोने के जेवर उतारकर पातु को देते हैं और दारु देने के लिये कहते हैं । पातु सोचती हैं कि ये ठग है जो पीतल के जेवरों को सोने के बताकर उसे मूर्ख बना रहे हैं इसलिए दारु देने से पहले सोने के जेवर सुनार के पास जांचने के लिए भेजती है । सुनार सोने की जांच करता है और बताता है कि जेवर बहुत कीमती है । जेवर की परख हो जाने के बाद पातु नौलखा बाग में बैठाकर बगड़ावतों को दारु देती है ।

इधर माली की शिकायत सुनकर रावजी अपने सेनापति नीमदेवजी को नौलखा बाग में भेजते हैं । रास्ते में उन्हें नियाजी मिलते हैं और अपना परिचय देते हैं । 

नियाजी से मिलकर नीमदेवजी वापिस राव दुर्जनसार के पास जाकर कहते हैं कि ये तो बाघजी के बेटे बगड़ावत हैं । रावजी कहते हैं कि फिर तो वे अपने ही भाई है । रावजी बगड़ावतों से मिलने नौलखा बाग में जाते हैं और सवाई भोज को अपना धर्म भाई बना लेते हैं । सभी बगड़ावतों को बड़े आदर के साथ नौलखा बाग में ठहराते है और पातू कलाली से दारू मंगवाते है और सवाई भोज को दारू पीने की मनुहार करते है । तब सवाई भोज ये शर्त रखते है कि अगर पातू मेरे इस बीडे को दारू से पूरा भर देगी तो मैं पी सकता हूँ । यह सुनकर पातु शर्त के लिये तैयार हो जाती है और सवाई भोज के पास जाती है और अपनी सारी दारु सवाई भोज की हथेली में रखे बीडे में उडेलती है । पातु की सारी दारु खतम हो जाती है, उसकी दोनों दारु की झीलें सावन-भादवा भी खाली हो जाती है, मगर सवाई भोज का बीडा नहीं भरता ।

यह चमत्कार देखकर पातु सवाई भोज के पांव पकड़ लेती है और कहती है कि आप मुझे अपनी राखी डोरा की बहन बना लीजिये, और सवाई भोज को राखी बान्ध कर अपना भाई बना लेती है ।

सवाई भोज नौलखा बाग से वापस आते समय मेघला पर्वत पर अपना दारु का बीड़ा खोलते हैं । बीड़े से इतनी दारु बहती है कि तालाब भर जाता है, धोबी उसमें अपने कपड़े धोने लगते है, वह शराब रिस कर पाताल लोक में जाने लगती है और पृथ्वी को अपने शीश पर धारण किये शेषनाग के सिर पर जाकर टपकती हैं, उससे शेषनाग कुपित हो जाते है, और तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु के पास जाकर बगड़ावतों की शिकायत करते हैं और कहते हैं कि हे नारायण बगड़ावतों को सजा देनी होगी । उन्होंने मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया है । आप कुछ करिये भगवान ।

बगड़ावत भारत कथा जारी है भाग 4 में .....

भोजा पायरा


सिंहासन बत्तीसी की पहली कहानी | रत्न मंजरी पुतली की कथा

रत्न मंजरी पुतली की कथा

सिंहासन बत्तीसी


सिंहासन बत्तीसी की पहली कहानी


राजा भोज सिंहासन बत्तीसी पर बैठने के लिए उत्सुक थे । लेकिन जब पहले दिन राजा भोज ने सिंहासन पर बैठने की कोशिश की तभी सिंहासन से पहली पुतली रत्न मंजरी प्रकट हुई । पहली पुतली रत्न मंजरी ने राजा को अपना परिचय दिया और कहा कि यह सिंहासन विक्रमादित्य का है और उनके जैसा गुणवान और बुद्धिमान ही इस पर बैठने योग्य है । अगर यकीन नहीं होता, तो राजा विक्रमादित्य की यह कहानी सुनकर फैसला करना कि तुम में ऐसे गुण हैं या नहीं । इतना कहने के बाद पहली पुतली रत्न मंजरी ने राजा भोज को कहानी सुनाना शुरू किया ।

एक बार की बात है, अम्बावती नाम का एक राज्य था । वहां के राजा धर्मसेन ने चार वर्णों की स्त्रियों से चार शादियां की थीं । पहली स्त्री ब्राह्मण थी, दूसरी क्षत्रिय, तीसरी वैश्य और चौथी शूद्र । ब्राह्मण स्त्री से हुए पुत्र का नाम ब्राह्मणीत, क्षत्राणी से उन्हें तीन पुत्र थे, जिनके नाम थे शंख, विक्रमादित्य और भर्तृहरि, वैश्य पत्नी से हुए पुत्र का नाम चंद्र था और शूद्राणी के बेटे का नाम धन्‍वतरि था । जब सभी लड़के बड़े हुए, तो ब्राह्मणी के बेटे को राजा ने दीवान बनाया, लेकिन वह अपनी जिम्मेदारी ठीक तरह से संभाल न सका और वो राज्य छोड़कर चला गया । कुछ वक्त तक वो कई जगहों में भटका और फिर वह धारानगरी नाम के राज्य में पहुंचा और वहां उसे एक अच्छा ओहदा मिला, लेकिन एक दिन उसने वहां के राजा को मार दिया और खुद राजा बन गया ।

कुछ वक्त बाद उसने वापस उज्जैन आने का फैसला किया, लेकिन उज्जैन पहुंचते ही उसकी मौत हो गई । उसके बाद क्षत्राणी के बड़े बेटे शंख को लगा कि उसके पिता विक्रम को राज्य का राजा बना सकते हैं । ऐसे में उसने अपने सोते हुए पिता पर हमला कर उसे मार डाला और खुद को राजा घोषित कर दिया । सभी भाइयों को शंख के षड्यंत्र का पता चल गया और सब इधर-उधर निकल पड़ें ।

शंख ने ज्योतिषियों का सहारा लिया और उन्हें अपने भाइयों के बारे में ज्योतिष विद्या के सहारे से पता लगाने को कहा । ज्योतिषियों ने बताया कि विक्रम को छोड़कर उनके सभी भाई जंगली जानवरों का शिकार बन गए थे, जबकि विक्रम बहुत ज्ञानी हो चुका है और आगे चलकर बहुत बड़ा सम्राट बनेगा ।

यह सुनकर शंख को बहुत चिंता होने लगी और उसने विक्रम को मारने की योजना बनाई । शंख के मंत्रियों ने विक्रम को ढूंढ निकाला और शंख को इसकी जानकारी दी । शंख ने एक तांत्रिक के साथ विक्रम को मारने की योजना बनाई । उसने तांत्रिक से कहा कि वो विक्रम को काली की आराधना की बात बताए और उसे सिर झुकाकर काली की पूजा करने को कहे, और जैसे ही विक्रम गर्दन झुकाएगा, तो वो उसकी गर्दन काट देगा ।

तांत्रिक विक्रम के पास गया और उसने शंख के कहे अनुसार विक्रम को काली की आराधना के लिए सिर झुकाने को कहा । शंख भी वहीं छिपा बैठा था । विक्रम ने खतरा महसूस कर लिया, और उसने तांत्रिक को सिर झुकाने की विधि बताने को कहा, तांत्रिक जैसे ही झुका शंख ने उसे विक्रम समझ कर उसकी गर्दन काट दी । इतने में विक्रमादित्य ने शंख के हाथ से तलवार लेकर उसकी भी गर्दन काट दी और अपने पिता की हत्या का बदला ले लिया ।

फिर विक्रमादित्य राजा बने और अपने राज्य और प्रजा का पूरा ध्यान रखने लगे । हर तरफ उनकी जय-जयकार होने लगी ।

एक दिन राजा विक्रमादित्य शिकार करने जंगल गए, उस जंगल में जाने के बाद राजा विक्रमादित्य को बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था । इतने में उनकी नजर एक खूबसूरत महल पर पड़ी, वो अपने घोड़े पर सवार होकर उस महल में पहुंचे । वो महल राजा बाहुबल का था ।

राजा विक्रम जैसे ही वहां पहुंचे, तो वहां के दीवान ने राजा विक्रमादित्य को कहा कि वो बहुत मशहूर राजा बनेंगे । लेकिन, उसके लिए राजा बाहुबल को उनका राजतिलक करना होगा । साथ ही उसने यह भी कहा कि राजा बाहुबल बहुत दानी है और जैसे ही विक्रमादित्य को मौका मिले वो राजा से स्वर्ण जड़ित सिंहासन मांग लें । यह स्वर्ण जड़ित सिंहासन भगवान शंकर ने राजा को भेंट दिया था । वह सिंहासन राजा विक्रमादित्य को सम्राट बना सकता है ।

राजा बाहुबल ने विक्रमादित्य का अतिथि सत्कार और राज तिलक किया । इस दौरान विक्रमादित्य ने सिंहासन की मांग की और राजा बाहुबल ने विक्रमादित्य को उसका सही हकदार समझते हुए बिना संकोच सिंहासन दे दिया । कुछ दिनों तक बाहुबल के महल में रहने के बाद राजा विक्रमादित्य सिंहासन लेकर अपने राज्य वापस आ गए । सिंहासन की बात दूर-दूर तक फैल गई। हर कोई राजा विक्रमादित्य को बधाई दे रहा था ।

इतना सुनाते ही पुतली रत्न मंजरी ने कहा कि राजा भोज अगर ऐसा कोई काम आपने भी किया है, तो आप इस सिंहासन पर बैठ सकते हैं । यह कहने के बाद पहली पुतली रत्न मंजरी उड़ गई । यह सुनकर राजा भोज ने उस दिन सिंहासन पर बैठने का फैसला टाल दिया और सोचा कि अगले दिन आऊंगा और सिंहासन पर बैठूंगा ।

कहानी से सीख – इस कहानी से यही सीख मिलती है कि कभी लालच नहीं करना चाहिए और दूसरों का बुरा नहीं सोचना चाहिए । जो दूसरों का बुरा चाहते हैं, उनके साथ कभी अच्छा नहीं होता है ।


सिंहासन बत्तीसी कथा

सिंहासन बत्तीसी की कहानी

 सिंहासन बत्तीसी की कहानी


सिंहासन बत्तीसी


बहुत समय पहले राजा भोज उज्जैन नगर पर राज्य करते थे । राजा भोज आदर्शवादी, सामाजिक एवं धार्मिक प्रवृति के न्यायप्रिय राजा थे, समस्त प्रजा उनके राज्य में सुखी एवं सम्पन्न थी । सम्पूर्ण भारतवर्ष में उनकी प्रसिद्धि फैली हुई थी ।

उज्जैन नगरी में कुम्हारों की एक चर्चित बस्ती थी । इस बस्ती के कुम्हार मिट्टी से आकर्षक और मनमोहक बर्तन बनाते थे । उनके द्वारा बनाए बर्तनों और आश्चर्यजनक कार्यों को दूसरे राज्यों में बड़े ही सम्मानपूर्वक देखा जाता था । यही कारण था कि इस बस्ती के सभी कुम्हार सम्पन्न और सम्मानित थे । कुम्हारों की इस बस्ती के आस-पास मिट्टी के छोटे-बड़े टीले थे, जिनकी मिट्टी बड़ी सुगंधित और चिकनी थी । इसी बस्ती में कई वर्षों से एक गड़रिया भी काम करता था जिसका नाम सूरजभान था ।

सूरजभान के घर से कुछ ही दूरी पर उसका एक घनिष्ठ मित्र रहता था । दोनों पड़ोसी होने के साथ-साथ एक दूसरे से इतना प्यार करते थे कि एक दूसरे के लिए अपनी जान तक दे सकते थे ।

लेकिन एक बार छोटे बच्चों के मध्य झगड़े को लेकर दोनों में अनबन हुई तो दोनों की दोस्ती दुश्मनी में बदलती चली गई । लेकिन सूरजभान ने अच्छे अवसर की तलाश कर फिर से दोस्ती को सहज बना दिया । लेकिन दूसरे गांव का एक व्यक्ति उनकी दोस्ती से नफरत करता था और उनकी दोस्ती तुड़वाना चाहता था । किन्तु उसे कोई मौका नहीं मिल रहा था ।

सूरजभान और उसके दोस्त को उस व्यक्ति के ईर्ष्यालु स्वभाव की कोई परवाह नहीं थी । वे दोनों दस-दस आदमियों पर भारी पड़ सकते थे । दोनों बड़े आराम से गांव के आस-पास के क्षेत्र के लोगों के पशुओं को चराया करते थे ।

एक दिन कुम्हार जब मिट्टी खोद रहा था तो मजबूत ईंट, मूर्तियां और घर-गृहस्थी का बहुत सारा सामान निकल आया । समस्त राज्य में यही चर्चा थी कि कभी वहां किसी राजा का दरबार था । वह महल भयानक भूकम्प के कारण देखते ही देखते तबाह हो गया । धीरे-धीरे इस मिट्टी के ऊंचे टीले पर कुम्हारों ने अपनी बस्ती बना ली । इसका मुख्य कारण यहां की चिकनी और लोचदार मिट्टी थी ।

सूरजभान का एक लड़का था । जिसका नाम चंद्रभान   चंद्रभान भी सामाजिकता में अपने पिता के पद चिन्हों पर ही चल रहा था । वह भी अपने पिता की तरह लोगों की भलाई करता था और सभी से मैत्रीपूर्ण व्यवहार करता था ।

जब लोग टीले की खुदाई करके उसमें मिलने वाले सामान को उठाकर ले जाने की कोशिश करते तो चंद्रभान उस सामान के बारे में कहता कि धरती माँ से प्राप्त वस्तुओं पर जनता का समान अधिकार है । कोई भी व्यक्ति इन सामानों को व्यक्तिगत नहीं मान सकता और ये सभी में बराबर-बराबर बटनी चाहिए ।

लोग उसकी बातों का उपहास उड़ाते थे और मूर्ख कहकर उस पर हंसते थे । चंद्रभान शरीर में तो कमजोर था किन्तु दिमागी ताकत में वह किसी से कम नहीं था । वह प्रत्येक दिन टीले पर जाता और लोगों को खुदाई में मिलने वाले सभी सामानों को बराबर-बराबर हिस्सों में बांटता । धीरे-धीरे लोग उसका सम्मान करने लगे । उसका यह स्वभाव देखकर कुछ लोग स्वार्थवश उससे नफरत करने लगे । कुछ लोग कभी- कभी उससे नजरें बचाकर टीले से मिट्टी खोदकर मूल्यवान वस्तुओं की चोरी जैसा कार्य भी कर लेते थे ।

मगर सबसे बड़ी आश्चर्य की बात यह होती थी कि जब चंद्रभान को चोरी से खुदाई करने वाले लोगों का पता चलता तो वह उन लोगों से सामान वापस लेकर, सामान का पुनः बटवारा कर देता था । धीरे-धीरे चंद्रभान के इस तरीके की चर्चा पूरे राज्य में फैलने लगी कि चंद्रभान एक न्यायप्रिय लड़का है । गांव के समस्त लोगों ने उसको सम्मान देना शुरू कर दिया । चंद्रभान की सभी बातें ज्ञान-ध्यान की होती थीं । वह लोगों को टीले पर एकत्रित कर लेता और उन्हें ज्ञान-ध्यान की बातें बताता था । सभी लोग ध्यान लगाकर उसकी बातों को सुना करते थे । कभी-कभी गांव के लोगों के बीच अन्य गांव के लोग भी शामिल हो जाया करते थे और उसकी बातें सुनकर राज्य के अन्य लोगों से भी चर्चा करते थे ।

चंद्रभान जब टीले से उतरकर अपने घर की ओर जाता था तो उसका व्यक्तित्व सभी लोगों को आकर्षित करता था । चंद्रभान हमेशा की तरह प्रत्येक सुबह उस टीले पर चढ़ जाता और आने वाले लोगों की बातें सुनता और कुछ-न-कुछ समाधान प्रस्तुत करता थे । उसकी बातों को सुनकर लोग अब अमल करने लगे थे ।

एक दिन चंद्रभान ने आने वाले लोगों से एक सवाल किया कि हमारे राज्य का राजा कौन है ? तो कुछ लोगों को राजा का नाम तक याद नहीं था । किसी ने तो उसका चेहरा भी नहीं देखा था, बल्कि एक ने कहा जब हमारे गांव में राजा आया तो पूरे गांव की फसल सैनिकों के आने से बर्बाद हो गई और पूरे गांव को सालभर भूखा मरना पड़ा ।

चंद्रभान ने लोगों की बातें सुनकर कहा कि राजा वह होता है जो मुसीबत के समय ही काम नहीं आता बल्कि मुसीबत आने से पहले ही कुछ-न-कुछ बंदोबस्त कर देता है ।

लोगों के मन में चंद्रभान की बात कुछ अटपटी लगी कि उसको राजा भोज के विषय में कुछ भी नहीं बोलना चाहिए था । गांव के लोगों की समस्या सुलझाना एक अलग बात है और पूरे राज्य की देख-रेख करना दूसरी बात है ।

अब गांव वालों को डर लगने लगा कि यदि चंद्रभान की बातें राजा भोज तक पहुंच गईं तो इसे अवश्य ही फांसी पर लटका दिया जाएगा ।

गांव के सभी लोगों के चेहरों का रंग उड़ चुका था । वे सभी सोच रहे थे कि अगर किसी ने इस बात को सुन लिया और जाकर राजा से शिकायत कर दी तो चंद्रभान के साथ-साथ गांव के सभी लोग भी राजा का अपमान करने के मुजरिम माने जाएंगे । क्योंकि सभी गांव वाले भी अपने राजा के विरुद्ध उसकी बातें सुन रहे थे ।

बस्तीवालों के दिल में डर बढ़ता चला जा रहा था । एक-एक करके सभी बस्ती वाले धीरे-धीरे उसकी चौपाल में कम जाने लगे । जब उसको एहसास हुआ कि अब बहुत कम लोग उसकी बातें सुनने आते हैं तो उसने टीले पर जाना कम कर दिया ।

जब उसने गांव वालों से टीले पर न आने का कारण पूछा तो लोगों ने कहा कि अगर तुम्हारी बातें किसी भेदिये ने सुन ली होती तो राजा के सिपाही तुम्हें पकड़कर ले जा चुके होते और साथ में हमें भी तुम्हारे जुर्म की सजा भुगतनी पड़ती ।

चंद्रभान ने गांव वालों को आश्चर्य से देखा, जैसे कि सभी लोग झूठ बोल रहे हों । उसने कहा कि मैंने किसी व्यक्ति विशेष के विषय में कुछ भी नहीं कहा बल्कि मैंने तो सामान्य बात कही कि एक राजा को कैसा होना चाहिए और वो किसी भी देश का हो सकता है । यदि मेरे जैसे सामान्य व्यक्ति के अनुसार अगर हमारा राजा भी उन विषयों का पालन नहीं करता तो तब भी मैं अपनी बात पर अटल हूं । धीरे-धीरे यह बात पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गई । गांव वालों में जो बातें हो रही थीं उसकी सुगबुगाहट दूसरे गांव के उस व्यक्ति तक पहुंची जो सुरजभान से ईर्ष्या करता था। उसने विचार किया, यह मौका अच्छा हाथ लगा है । उसने गांव के अन्य लोगों से भी इस विषय में पूछताछ की ।

उसने सोचा कि सूरजभान से बदला लेने का इससे अच्छा अवसर और कोई नहीं हो सकता है । अगले दिन उसने सारा काम छोड़कर दोपहर के समय चंद्रभान को टीले पर बैठे हुए देखा । वह टीले पर गांव वालों से बात कर रहा था । उसने देखा कि चंद्रभान दो लोगों के आपसी झगड़े निपटा रहा था । दोनों का झगड़ा एक बकरी को लेकर था । उस बकरी पर दो लोग अपना-अपना अधिकार जमाने का प्रयास कर रहे थे । चंद्रभान टीले पर बैठे-बैठे ही उनकी समस्या सुन रहा था ।

व्यक्तियों की समस्या हल करते हुए उसने ऐसा न्याय किया, जिसे देख-सुनकर लोग चकित हो गये । उनमें से एक व्यक्ति खुशी-खुशी अपनी बकरी लेकर चला गया और दूसरा व्यक्ति चंद्रभान के न्याय से संतुष्ट था ।

यह एक उलझा हुआ मामला था, गांव वालों में किसी का भी दिमाग काम नहीं कर रहा था लेकिन चंद्रभान ने असली दावेदार को आसानी से पहचान लिया ।

उसने अगले दिन पड़ोसियों के बीच एक बच्चे को लेकर हुए विवाद को निपटाते देखा । उस दिन भी चंद्रभान के न्याय की तारीफ सभी गांव वाले कर रहे थे ।

जब कुछ ही दिनों में चंद्रभान का नाम दूर-दूर तक फैला तो उससे ईर्ष्या करने वाला दूसरे गांव का व्यक्ति और अधिक परेशान हो उठा कि चंद्रभान की चर्चा दूर-दूर तक फैल चुकी थी । एक दिन उसने मौका पाकर राजा भोज से शिकायत कर दी हे राजा भोज, सूरजभान का लड़का स्वयं अपने आपको राजा मानकर प्रजा की समस्याओं का निदान कर रहा है ।'

'महाराज ! वह आपके लिए अपशब्दों का भी प्रयोग कर रहा है ।'

ईर्ष्यालु भानूप्रताप मन ही मन प्रसन्न हो रहा था कि वह अब किसी भी सूरत में नहीं बच सकता । उसे भी अपने अपमान का बदला चुकाने का अच्छा मौका दिख रहा था ।

राजा भोज ने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि 'वे सूरजभान के लड़के पर नजर रखें । उसके पास न्याय पाने जाने वालों को रोकें और फरियादियों को न्याय के लिए मेरे पास लेकर आएं ।' सिपाहियों ने राजा भोज के आदेश का पालन करना शुरू कर दिया

अगले दिन एक व्यापारी को राज दरबार में लाया गया । राजा भोज ने व्यापारी से राजदरबार में आने का कारण पूछा । व्यापारी ने कहा " महाराज मैं एक छोटा-सा व्यापारी हूं और व्यापार करना मेरा मुख्य पेशा है । नगर से बाहर जाते समय मैंने अपने व्यापारी मित्र के पास कुछ बहुमूल्य वस्तुएं बतौर अमानत रखी थीं, ताकि जब मैं लौटकर आऊं तो मेरी बहुमूल्य वस्तुएं सुरक्षित वापिस मिल सकें । जब मैंने व्यापारी मित्र से वे बहुमूल्य वस्तुएं मांगी तो उसने देने से इंकार कर दिया । इसीलिए हम दोनों का आपस में झगड़ा हो गया है ।"

“महाराज ! मुझे मेरी वस्तुएं वापस दिला दीजिए, मेरे साथ न्याय कीजिए महाराज, यही वस्तुएं परिवार का एक मात्र सहारा हैं ।" राजा ने व्यापारी द्वारा लगाए गये आरोप के बारे में उसके व्यापारी मित्र से पूछा तो व्यापारी मित्र ने कहा कि 'यह बात तो सत्य है कि व्यापार के लिए जाते समय यह अपनी बहुमूल्य वस्तुएं मेरे पास रख गया था । इसने मुझसे वायदा किया था कि वह छ: महीने बाद लौटकर अपनी वस्तुएं वापिस ले लेगा । जब यह छ: महीने बीत जाने के बाद लौटा तो मैंने इसकी अमानत लौटा दी ।'

राजा भोज ने उस व्यापारी से कहा कि क्या तुम्हारे पास कोई गवाह है जो यह सिद्ध कर सके कि तुमने इसकी बहुमूल्य वस्तुएं लौटा दी थीं ।'

“ अवश्य महाराज ! मैंने गांव के मुखिया और मंदिर के पुजारी के सामने सभी वस्तुएँ लौटायी थीं ।'

व्यापारी के मित्र की बात सुनकर राजा भोज ने उन दोनों को बुलाने का आदेश दिया । कुछ देर बाद राजा के सिपाही मुखिया और पुजारी को दरबार में ले आए । दोनों की गवाही व्यापारी के मित्र के पक्ष में थी । उन दोनों की पूरी बात सुनने के बाद राजा ने अपना निर्णय सुनाया ।

“यह व्यापारी झूठ बोल रहा है । इसलिए उसे आदेश दिया जाता है कि वह झूठ बोलने के अपराध में अपने मित्र व्यापारी से क्षमा मांगे वरना उसे राजदण्ड भोगना पड़ेगा ।'

“यह न्याय नहीं, अन्याय है अन्नदाता, यदि मैं चन्द्रभान के पास न्याय हेतु जाता तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता । लेकिन आपके सिपाही जबरदस्ती हमें पकड़कर आपके दरबार में ले आए ।' व्यापारी ने रोते हुए कहा

व्यापारी की बात सुनकर राजा भोज क्रोधित नहीं हुए बल्कि यह सोचने लगे कि सूरजभान का लड़का कैसा न्याय करता है, जिसकी चर्चा हर जगह है । उसे चलकर देखना चाहिए ।

राजा भोज ने कहा- “अगर तुम दोनों मेरे न्याय से असंतुष्ट हो तो जाकर उसी से न्याय मांगकर देख लो । मैं भी देखना चाहता हूं कि वह किस प्रकार का न्याय करता है ।'

राजा भोज की बात सुनकर व्यापारी और दोनों गवाह भी उसके पीछे-पीछे चल दिए । बस्ती के सबसे ऊंचे टीले पर हमेशा की तरह, चंद्रभान पहले से ही बैठा हुआ था । गांव के लोग उसके इर्दगिर्द जमा थे । राजा भोज भी भेष बदलकर वहां बैठ गया और उसका न्याय देखने लगा ।

व्यापारी ने चंद्रभान को जब अपनी विपदा सुनाई तो उसकी बात सुनकर चंद्रभान तेज स्वर में बोला- “न्याय करने के लिए राजा होने की आवश्यकता नहीं, न्याय का अपना दृष्टिकोण होता है । यदि न्यायपूर्ण दृष्टिकोण हो तो कोई भी किसी भी समय सही न्याय कर सकता है ।'

“यदि मेरे वश में होता तो राजा भोज को यहां बुलाकर दिखाता कि न्याय किसे कहते हैं ।' चंद्रभान ने सबसे पहले व्यापारी के गवाह गांव के मुखिया और मंदिर के पुजारी को बुलाया और पूछा कि बताओ उन बहुमूल्य वस्तुओं में कौन-कौन-सी कितनी वस्तुएं थीं ?

चंद्रभान का यह सवाल सुनते ही मुखिया और पुजारी के होश उड़ गये । उन्होंने लड़खड़ाती जुबान में कहा " हमने तो बस पोटली देखी थी ।"

व्यापारी के मित्र से चंद्रभान ने कहा कि तुमने तो कहा था कि उन दोनों को दिखाकर बहुमूल्य वस्तुएं लौटा दी थीं । अरे तुम तो एक बेईमान इनसान हो । दोनों को झूठी गवाही देने के लिये किस प्रकार का सौदा किया था ? व्यापारी मित्र बुरी तरह कांपने लगा, उसकी टांगें लड़खड़ाने लगीं । व्यापारी का मित्र चंद्रभान के कदमों में गिरकर रोने लगा ।

मुझे क्षमा करें ! मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई ।

“ मैं इनकी बहुमूल्य वस्तुएं लौटाने का वादा करता हूं कि घर जाते ही इनकी वस्तुएं दे दूंगा ।'

राजा भोज ने देखा कि सूरजभान का लड़का चतुर और न्याय प्रिय है । राजा उसके न्याय करने का ढंग देखकर काफी प्रभावित हुए और अपने राजमहल वापस आ गये । वह रात भार चंद्रभान के बारे में सोचते रहे । अगले ही दिन उसने चंद्रभान को राजदरबार में बुलाया और कहा कि " मैं तुम्हारे न्याय करने के तरीके से काफी प्रभावित हूं । लेकिन एक बात हमारी समझ में नहीं आई ।'

' कौन-सी बात महाराज ?' चंद्रभान ने हाथ जोड़कर राजा भोज से पूछा

“तुम अनपढ़ और एक मामूली चरवाहे हो फिर भी इतना अच्छा न्याय कैसे कर लेते हो ?”

“यह सब उस टीले की करामात है महाराज ! जब भी मैं उस टीले पर बैठता हूं तो मुझमें न जाने कौन-सी शक्ति आ जाती है । मैं वहां बैठकर ही सही न्याय करता हूं । बाकी जगह तो मुझसे कुछ बोला भी नहीं जाता है ।'

राजा भोज ने काफी सोच-विचार करने के बाद अपने मंत्रियों से विचार-विमर्श किया । अंततः: यह निर्णय हुआ कि टीले के नीचे अवश्य ही कोई देवीय शक्ति है, इसे खुदवाकर देखा जाए ।

अगले ही दिन सैकड़ों मजदूरों ने उस टीले की खुदाई की । बहुत गहराई तक खुदाई करने के पश्चात‌ मजदूरों को एक राजसिंहासन मिला । राजा भोज ने देखा तो सिंहासन की चमक से उसकी आंखें चौंधिया गईं । उनके सामने सोने-चांदी एवं रत्नों से जड़ा हुआ बहुमूल्य सिंहासन था ।

राजा भोज के आदेश पर सिंहासन को राजमहल लाया गया । सिंहासन को साफ किया गया । सफाई के बाद वह और निखर गया । इतना सुन्दर सिंहासन अभी तक किसी ने भी नहीं देखा था ।

सिंहासन के चारों ओर आठ-आठ पुतलियां बनी थीं । पुतलियां इतनी सजीव लगती थीं मानों अभी बोल पड़ेंगी । राजा भोज ने इस सिंहासन पर बैठने के लिए एक दिन निश्चित किया और उस दिन दरबार में जश्न का सा माहौल बना हुआ था । राजा भोज जैसे ही सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़े तभी सिंहासन में जड़ी सभी बत्तीस पुतलियां राजा भोज को देखकर हंसने लगीं । राजा भोज ने सहमकर अपने कदम पीछे खींच लिए और उन पुतलियों से पूछा- 'पुतलियो तुम सब मुझे देखकर एक साथ क्‍यों हंस रही हो ?'

राजा भोज का प्रश्न सुनकर एक पुतली रत्नमंजरी राजा भोज को कुछ बताने के लिए आगे आयी ।


प्रथम पुतली रत्नमंजरी की कथा अगले भाग में जारी है ..........