लिछमा बाई रो मायरो

 राजस्थानी ऐतिहासिक कथा लिछमा बाई रो मायरो




उस समय की बात है जब भारतवर्ष में मुगल बादशाह का राज था । नागौर में जायल और खिंयाला दो पड़ौसी रियासत हुआ करती थी । जिनमें दो चौधरी ( जाट ) नम्बरदार हुआ करते थे । नाम था गोपाल जी और धर्मो जी । गोपाल जी जायल गांव के बासट गौत्र के जाट और धर्मो जी खिंयाला के बिडियासर जाट । दोनों चौधरी उस समय दिल्ली के बादशाहों के लिए लगान संग्रहण करने का कार्य किया करते थे ।


वे साल में एक बार किसानों से निर्धारित रकम वसूला करते और बादशाह तक पहुंचा दिया करते और बदले में अपनी तनख्वाह ले लिया करते थे ।


हमेशा की तरह इस बार भी दोनों चौधरीयों ने लगान इकट्ठा किया और ऊंटों पर रकम लाद कर बादशाह को सौंप देने दिल्ली के लिए रवाना हुए । रास्ता लम्बा था और चोर-लुटेरों के हमलों से बचने के लिए दोनों ने बंजारों का रूप धारण कर लिया ।


शाम ढलने तक दोनों जयपुर के नजदीक हरमाड़ा नाम के एक गांव तक पहुंचे । दिन भर चलते चलते दोनों थक चुके थे, इसलिए हरमाड़ा गांव के पास चौधरियों ने डेरा जमाया । गोपाल जी तालाब में ऊंटों को पानी पिलाने गए और धर्मोजी पीतल की गगरी लेकर कुवे पर पानी लेने गये ।



दैवयोग से उसी दौरान गांव की गुर्जर जाति की एक सामान्य सी गृहिणी, लिछमा गुर्जरी । अपनी जेठानियों की पुत्रियों के साथ अपनी पुत्री के विवाह के प्रबंध में लगी थी । लेकिन विवाह के उत्साह से बिल्कुल परे वह आकुल, व्याकुल, दुविधाग्रस्त थी । कारण ये था कि पीहर में उसका कोई भाई नहीं था, और माता पिता भी इतने बूढ़े हो चुके थे की जो उसकी पुत्री के विवाह में भात भरने के लिए नहीं आ सकते थे ।


भात या मायरा राजस्थान की प्रथा है जिसमें विवाह के सुअवसर पर मातुल पक्ष के लोग सामर्थ्यानुसार वस्त्र, आभूषण आदि कुछ उपहार ले कर प्रस्तुत होते हैं ।


लेकिन उपहार और सहायता के नाम पर चली ये परम्परा धीरे धीरे प्रतिष्ठा का प्रश्न बन महिलाओं के लिए गले की फांस बन गयी ।

अब हालात ये है कि जब तक मायके से मायरा आ न जाए, तब तक ना तो नारी चिंता मुक्त हो पाती थी और ना ही कुल कुटुम्ब उसे चैन की सांस लेने देते थे । भात में कितने पैसे आए ? कौन कौन से आभूषण आए ? किस भाँति के वस्त्र आए इत्यादि प्रश्नों के उत्तर आने वाले कई दिन-महीनों-सालों तक ससुराल में नारी की प्रतिष्ठा और महत्त्व को निर्धारित करते थे । भात कम आने का अर्थ ही जहाँ जीवन भर सास-ननद, देवरानी-जेठानी आदि के ताने हुआ करता हो, वहाँ भात नहीं आने पर क्या हाल हो सकता है ? कल्पना सहज ही की जा सकती है ।


अगले दिन विवाह का कार्यक्रम निश्चित था । जेठानीयों की पुत्रियों का भी विवाह था । उनका भी भात कल ही आना था, वे दोनों अपने अपने पिता-भाई और भात के स्वागत का प्रबंध कर रही थीं ।


ऐसे में लिछमा स्वयं को दुर्भाग्यशाली न समझे तो क्या करे । मां के जाए बीर बिना कुण भात भरण ने आवे ! आंसू आंखों की कोर में तैर रहे थे, छलके नहीं । क्योंकि अभी तक इस प्रसंग पर चर्चा हुई नहीं थी । लिछमा को लगा- मेरे मायके की स्थिति सर्वज्ञात है, हो सकता है इसी से मुझे मायरे से मुक्ति दे दी गई हो ।


लेकिन ऐसा थोड़े ही हुआ करता है । पंजाब में कहावत है- सांप में एक 'स', सास में दो 'स', सास ये मौका ऐसे ही थोड़े छोड़ देने वाली थी । सास समुदाय की प्राचीन एवं प्रचलित परम्परा का पूर्ण रूपेण निर्वहन । खुल कर तिक्त वचन सुनाए गए । भात बिना कोई विवाह हुआ है कभी जो तेरी बेटी का हो जाएगा, फूटे भाग हमारे जो तेरे जैसी बहु मिली, मर क्यों नहीं जाती कहीं जाकर !


अपमान के नमक से अंतर के घाव चिरमिरा उठे । लिछमा रोने लगी । मन में विचार आया-तिरस्कार सह कर जीने से तो अच्छा प्राण ही दे दिए जाएं । कौनसा सार बचा है जीवन में ।


पनघट से पानी लाने का बहाना बनाया, घड़ा उठाया और रोते रोते चल पड़ी । लिछमा पनघट पर बैठ के खुल के रोई, सोचा- मरना तो है ही, जी तो हल्का करूँ । राम जाने विधाता ने कैसे भाग लिखे हैं, जो कोई मेरा भी भाई होता तो आज मरने की नौबत थोड़े ही आती ।


और भाग्यवश, दैव योग से ही, लिछमा का रुदन पानी भरने आये धर्मो चौधरी के कानों में पड़ा । चौधरी रुदन सुन चौंका । सूर्य पश्चिम में ढल चुका है और रात्रि का अँधेरा गहराने लगा और ऐसे समय में पनघट के नजदीक स्त्री कण्ठ से रुदन की ध्वनि ? यह कौन दुखियारी है ?

धर्मोजी उठे और रुदन की आवाज सुनते हुए लिछमा तक पहुंचे और बोले “ पणिहारी ! रोती क्यों है ? कौन विपत्ति आन पड़ी ? मुझे बता, शायद मैं कुछ सहायता कर सकूँ ?


लिछमा ने सोचा इसे सुना कर ही क्यों न मरूँ, मरना तो है ही, जी तो हल्का हो । लिछमा ने चौधरी को सब कुछ कह सुनाया । चौधरी साहब व्यथा सुन व्याकुल हो गए और बोले- “ पणिहारी, कौन कहता है तेरा कोई भाई नहीं है, मुझे राखी बांध, मैं तेरा भाई हूँ ।“


लिछमा हिचकिचाई, चौधरी फिर बोला - लिछमा, चीर फाड़ के बांध कलाई पर, मैं तेरा धर्म का भाई हूँ । अब से तेरा सम्मान मेरा सम्मान । तेरी लाज मेरी लाज । तेरी व्यथा - मेरी व्यथा । भात की चिंता मत कर । भात मैं भरूँगा ।


चौधरी की जबान थी, लिछमा आश्वस्त हो गई ।



लिछमा के ओढ़नी के टुकड़े ने चौधरी की कलाई पर बन्ध कर भाई बहन के रिश्ते की नींव पड़ने की साख भरी । गूजरी दुःख की घड़ी में भाई का सा स्नेह पा बड़ी प्रसन्न हुई और घड़ा उठा घर की ओर चली ।

घर पहुंचने पर जब सास-ननद, जेठानी-देवरानी ने विष बुझे वचन शरों का वर्षण किया तब लिछमा ने आप बीती बताई और बोला कि सुबह मेरा भी धर्मभाई भात लेकर आने वाला है ।

लिछमा की बातें सुन सभी ने मजाक उड़ाया और बोला कि वो तो बंजारे है, उन्होंने तुम्हें बेवकूफ बनाया है, और सुबह तक यहाँ से चले भी जायेंगे । ऐसे कोई राह चलता किसी का माहिरा भरता है भला ?

लिछमा के पति ने भी उसे समझाया कि ऐसा नहीं होता और यदि उन बंजारों के पास ही माहिरा भरने के रुपये होते तो घरबार छोड़कर क्यों घूम रहे होते ? देखना सुबह तक वो अपनी राह पर आगे निकल जायेंगे ।


लेकिन लिछमा तो मन ही मन मुदित थी, प्रमुदित थी सो सब झेलती रही ।


उधर, धर्मोजी ने गोपालजी को सारा वृत्तांत सुनाया और कहा - वचन दे आया हूँ, सुबह भात भरना है । दूसरा चौधरी जबान की कीमत समझता था, भात भरने का कह दिया, मतलब भात तो भरना ही है ।


लेकिन, पैसे कहाँ से आएं ? ऊंटों पर जो रकम लदी है, वो तो मालगुजारी के पैसे हैं । बादशाह की अमानत। भारतवर्ष पर एकछत्र राज करने वाले बादशाह की अमानत और इस अमानत में खयानत करना यानी अपनी मौत को आमन्त्रित करना । रकम भी कोई छोटी मोटी नहीं थी, पूरी 22000 सोने अशर्फियाँ । ये खर्च करने पर बादशाह ज़िंदा तो नहीं छोड़ेगा । ये तो तय है । क्या किया जाए ?

लेकिन, वचन देकर पलट जायें, इससे अच्छा तो यही कि गर्दन कट जाये । हम वीर तेजाजी के वंशज है, “ प्राण जाय पर वचन न जाई “ भात तो भरेंगे । बादशाह जो करेगा, देखा जाएगा ।


चौधरियों ने रातों रात खूंटों से बंधे ऊंटों को खोला, सवार हुए और घण्टे भर में जा पहुंचे जयपुर । कुछ पुरानी पहचान और कुछ अशर्फियों की खनक ने आधी रात में दो चार दुकानें खुलवाई और मायरे के लिए उपहार, वस्त्र और आभूषण खरीदे और भोर होते होते पुनः हरमाड़ा पहुंच गए ।

सुबह, जब बात गांव भर में फैली कि लिछमा के धर्म भाई आए हैं और भात भी भरा जाएगा तो इसे मजाक समझ देवरानी जेठानी ने मुंह बनाया । कल तक तो कोई भाई न था । अब कौन कृष्ण भगवान भात भरने आ रहे हैं ।

खुशी से फूली न समाती लिछमा, पूरे परिवार के साथ गांव के बाहर धर्मोजी और गोपाल जी का स्वागत करने पहुँची । धर्मोजी और गोपाल जी दो कपड़ो के थानों से लदी बैलगाड़ियों के साथ गांव के बाहर खड़े थे ।

धर्मोजी ने बाई लिछमा को चुन्दड़ी ओढाई और ढोल नगाड़ों के साथ गांव में प्रवेश किया ।

पूरे गांव में लिछमा गुर्जरी और उसके दोनों चौधरी भाईयों की बातें होने लगी । इधर लिछमा की दोनों जेठानियाँ जल-भूनकर काली पड़ गई । दोनों ने आपस में मन्त्रणा की और निश्चय किया कि किसी भी तरह दोनों चौधरियों को लिछमा का माहिरा नहीं भरने देना है वरना उनका नाक कट जायेगा ।

जेठानियों ने अपने पतियों को पिरोया और उन्हीं की अंगुलियों पर नाचते दोनों जेठ और ससुर, गांव के पंचो के साथ चौधरियों के पास पहुँच गए ।

“ चौधरियों ! लिछमा का माहिरा लेकर तो आप आ गए । लेकिन हमारे गांव में माहिरा भरने के कुछ नियम है वो तो आपको मानने पड़ेंगे ।“ पंच ने लिछमा के जेठों ने जैसा सिखाया था बोलना शुरू किया

“ देखो पांचों ! हम बाई लिछमा का माहिरा भरने आये हैं तो माहिरा तो भरके जायेंगे ।“ गोपाल जी ने मुछ मरोड़ते हुए कहा “ अब आपके यहाँ जो भी नियम है बता दीजिए ।“

“ हमारे यहाँ जो भी माहिरा भरने आता है उसको ढोली, नाई, कमीणा को नेग में बेस देना पड़ता है ।“ पंच ने कहा

“ पंचो ! ढोली– नाई छोड़ो, आप तो पूरे गांव के ही घर बता दो कितने है ?” धर्मोजी ने कहा

पंच समझ गये की ये तो माहिरा भरे बिना नहीं जाने वाले ।

यह खबर जब वापस देवरानी, जेठानी के कानों पहुँची तो दोनों मिलकर अपने भाइयों के पास गई और बोली कि भले दो दोनों मिलकर माहिरा भर देना परंतु इन चौधरियों से पीछे नहीं रहना है ।



शाम के समय माहिरा भरने लगा ।

दोनों चौधरियों ने पूरे गाँव के घर घर में कपड़े पहनाये, लिछमा गुर्जरी को नोरंगी चुनरी ओढ़ाई और उपहारों से घर भर दिया ।

इधर लिछमा की देवरानी जेठानी के भाईयों ने मिलकर सौ चांदी की मोहरें माहिरा में भरी । चौधरियों ने बची हुई बिस हजार सोने की अशर्फियाँ थाली में भर दी । पूरे गाँव में दोनों चौधरियों की जय जयकार होने लगी । पूरे कुल कुटुम्ब के बीच लिछमा नौरंगी चूनरी ओढ़े खड़ी थी । भाव विह्वल । एक सूत्र की शक्ति, एक धागे की ताकत संसार देख रहा था । अज्ञात कुल, नाम, ग्राम की नारी, जिसे कल तक देखा तक न था, उसके हाथों रक्षा सूत्र बन्ध जाने के बाद, उसके सम्मान की रक्षा की खातिर चौधरी बादशाह तक को चुनौती दे बैठे । रक्षा सूत्र से बंधे भाईयों ने बहन के सम्मान की रक्षा की और भात में दोनों ऊँटों सहित सारी माया लुटा, हाथ जोड़, चौधरी दिल्ली को निकल पड़े ।


दो चार दिन बाद दिल्ली पहुंचे, दरबार में हाजरी लगाई । मालगुजारी जमा करवाने के वक़्त बादशाह के सम्मुख हाथ जोड़ खड़े हो गए । पूरा वृत्तांत कह सुनाया । मौत का भय तो था ही नहीं, मरना तो निश्चित मान के गए थे ।

लेकिन- "हिम्मत कीमत होय, बिन हिम्मत कीमत नहीं ।" "कर भला तो हो भला।"

बादशाह घटना सुन कर और चौधरियों की हिम्मत देख कर प्रभावित हो गया । उसने घटना की सत्यता जांचने का हुक्म दिया और सत्यता प्रमाणित होते ही दोनों चौधरियों को पुरस्कृत भी किया ।

दोनों चौधरी बादशाह के यहां से 1000 बीघा जमीन पुरस्कार में प्राप्त कर खुशी खुशी घर लौटे और हजार बीघा जमीन के साथ ही कमा लाए- हजारों वर्षों के लिए नाम ।

राजस्थान में आज तक बहनें अपने भाईयों से उन चौधरियों की तरह बनने को कहा करती है । वचन के पक्के, निडर, हिम्मती और दरियादिल । आज भी रक्षा बंधन के और भात के गीतों में ये पंक्तियां गाई जाती हैं-

" बीरा बणजे तू जायल रो जाट ।

बणजे खिंयाला रो चौधरी ।।“

ढोली व डूम भी गाँव गाँव इस गाथा का बखान करते हुए गाते है " खिंयाला रा चौधरी बडियासर बंका, न मानी राज की शंका ।"

आज भी खिंयाला के जाट इस परंपरा का निर्वाह करते है । “ यदि किसी स्त्री के पीहर में कोई माहिरा भरने वाला नहीं है और वह स्त्री खिंयाला जाकर माहिरा का न्यौता देती है, भले ही स्त्री किसी भी जाति की हो । खिंयाला के जाट सब शामिल होकर उस औरत के ससुराल जाकर माहिरा भरकर आते हैं ।



0 comments:

Post a Comment