Sita Mata wildlife sanctuary, Pratapgarh Rajasthan

Sita Mata Wildlife Sanctuary is a wildlife sanctuary situated in south-east portion of Pratapgarh district (Rajasthan). The Sanctuary provides rich pastures for a variety of Deer that includes the Chowsingha and for Caracal wild Boar, Pangolin and Leopards. Sitamata Sanctuary is spread over the Aravali and Vindhyachal mountain ranges and is the only forest region where teak trees of building value are found. In this sanctuary, around 50% trees are of teak. Besides these salar, tendu, amla and bamboo bel are also found in abundance. The leopard, hyena, jackal, fox, jungle cat, porcupine, spotted deer, wild bear, four - horned antelope and Nilgai are the animals found in Sita Mata wildlife sanctuary.
The most conspicuous animal of the Sita Mata sanctuary is the flying squirrel which can be seen gliding from one tree to another after sunset. Its activities are nocturnal and during the day the day it hides in the hollow. The best time to see this squirrel is between February and March at Arampura Forest Guest House, when most of the trees shed their leaves and it is easier to spot the squirrel on the branches of leafless trees. Here are some more facts about Pratapgarh and Sita Mata wildlife sanctuary, Pratapgarh Rajasthan in Hindi.
- प्रतापगढ़ राजस्थान  का  33 वां जिला है जो राजस्थान के दक्षिणी भाग में स्थित है । इसकी भौगोलिक स्थिति 24.03° N 74.78° E है । 
- प्रतापगढ़ में कुल पाँच उपखण्ड हैं : छोटी सादडी, प्रतापगढ़, अरनोद, पीपलखूंट और धरियावद ।
'कान्ठली' स्थानीय ग्रामीण बोली है ।
- सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य, जहाँ बहने वाली जाखम नदी एवं में महुआ पेड़ के के कोटर में पायी जाने वाली उड़न गिलहरी प्रमुख आकर्षण हैं
- गौतमेश्वर तीर्थ आदिवासियों का एक प्रमुख 'तीर्थ' है ।  यहाँ 'मीणा' समाज के जनजातीय श्रृद्धालुओं का सालाना-मेला भरता है, जिसमें दूर-दूर तक के हजारों आदिवासी जोर-शोर से हिस्सा लेते हैं।

- प्रतापगढ़ की विशिष्ट हस्तकला 'थेवा' कला प्रसिद्ध है । कांच पर मीनाकारी के आभूषण बनाने का हस्तशिल्प थेवा, जिसके आविष्कार का श्रेय पुराने ज़माने के एक स्वर्णकार नाथूजी सोनी को दिया जाता है ।
- इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा (1863–1947) के अनुसार "प्रतापगढ़ का सूर्यवंशीय राजपूत राजपरिवार मेवाड़ के गुहिल वंश की सिसोदिया शाखा से सम्बद्ध रहा है"।
- मौताणा यहां की एक विशिष्ट परम्परा है, जिसमे दुर्घटना में या अप्राकृतिक परिस्थितियों में मौत हो जाने पर सारी की सारी आदिवासी आबादी 'दोषी' या अपराधी का तब तक घेराव रखती है, जब तक उसके द्वारा नकद मुआवजे का इंतजाम नहीं कर दिया जाता.
- प्रतापगढ़ अफीम का बड़ा उत्पादक जिला है साथ ही महुए से शराब बनाना एक आम बात है
- जाति-बिरादरी का सहभोज 'मोसर' हर शादी में आयोजित होता है। बहुपत्नी विवाह का प्रचलन है साथ ही बाल विवाह की कुप्रथा का यहाँ राजस्थान के बाकि हिस्सों के मुकाबले प्रचलन कम है ।
- पहनावा: स्त्रियां सिर पर 'बोर' या 'बोरला', पांवों में 'कड़ी', बाहों में 'बाजूबंद', बालों में 'लड़ी-झुमका', उँगलियों में अंगूठियां और नाक में 'नथ' या 'लॉन्ग' धारण करती हैं। आदमी अक्सर साफा, पाग(पगड़ी) धोती और सूती कमीज़ या अंगरखा-कुर्ता पहनते हैं ।